गुरु- प्रज्ञावतार की चेतना से गहरा सम्पर्क सधे, ऐसी साधना करनी है

Published on 2018-07-23
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प्रज्ञा परिजनों, प्रज्ञा पुत्रों एवं प्रज्ञा पुंजों की संख्या और गुणवत्ता बढ़नी चाहिए
सच्चे आत्मीय बनें
महापुरुषों, अवतारियों से किसी भी व्यक्ति का, किसी भी प्रकार सम्पर्क बने तो कुछ न कुछ लाभ तो होता ही है, लेकिन जो व्यक्ति उनके साथ विचारात्मक, भावनात्मक सम्पर्क बना लेते हैं उन्हें अद्भुत, असाधारण लाभ प्राप्त हो जाते हैं। गाँधी जी के सम्पर्क में आने वाले दुकानदार, व्यवसाई, ग्रामवासी सभी को लाभ तो मिले ही थे, परन्तु जिन्होंने उनकी चेतना से सम्पर्क जोड़ा, जो उनके आत्मीय बने, उन मोतीलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया, आचार्य कृपलानी, आचार्य विनोबा भावे आदि को जो लाभ मिले उन्हें शब्दों में बखाना नहीं जा सकता।
पू. गुरुदेव के साथ भी उनके गाँववाले, प्रेस वाले, दुकानदार, जो भी सम्पर्क में रहे उन सभी को कुछ न कुछ उल्लेखनीय लाभ मिले; लेकिन जिन्होंने युगऋषि, महान विचारक, क्रांतिकारी लोकसेवी, महाकाल के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में समझा- अपनाया, उनके जीवन धन्य हो गए। ऋषियों- अवतारियों का यही क्रम रहा है। जिसने उन्हें जिस गहराई से समझा- सम्बन्ध बनाया, उन्हें उसी अनुपात में लाभ मिले। भगवान श्रीकृष्ण ने इस तथ्य को प्रकट करते हुए गीता में कहा है, "जो व्यक्ति जिस भाव से मेरे प्रति झुकता है, मैं उसी के अनुसार उसकी सेवा- सहायता कर देता हूँ।"

ये यथा मां प्रपद्यन्ते, तांस्तथैव भजाम्यहम्।
अस्तु युगऋषि के आन्तरिक स्वरूप को समझने, उससे आत्मीय सम्बन्ध बनाने से ही उनके प्रभाव के विशिष्ट लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्हीं के शब्दों में उनके स्वरूप को समझने का प्रयास करें। अखण्ड ज्योति जुलाई- ७७ के अंक में लिखा है-
"यदि किसी को हमारा वास्तविक परिचय प्राप्त करना है तो नवयुग के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में हमारे समूचे जीवन का -समूचे व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना चाहिए। हमारे रोम- रोम में, चेतना के रूप में बसा हुआ भगवान यह रास रचाये हुए है।"
गागर में सागर :: इन थोड़े से शब्दों में जिस तथ्य की अभिव्यक्ति हुई है, उसे गागर में सागर भरने की उक्ति के साथ जोड़ा जा सकता है। विद्वान, तपस्वी, लेखक, वक्ता, सिद्ध पुरुष बहुत से हुए हैं, किन्तु उन सब विशेषताओं- विभूतियों का उपयोग व्यक्तिगत प्रभाव बढ़ाने, यशस्वी बनने, लोगों के दु:ख- दर्द दूर करने से लेकर स्वर्ग- मुक्ति आदि की प्राप्ति के लिए किया जाता रहा। पू.गुरुदेव की हर विशेषता, हर विभूति का उपयोग नवयुग अवतरण के ईश्वरीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है। उनके जीवन में जो अद्भुत कार्य होते रहे हैं, उन्हें वे अपने रोम- रोम में बसे हुए भगवान की रासलीला के रूप में देखते हैं। जो व्यक्ति, जो साधक उनके जीवन का गहराई से अध्ययन करते हैं, उन्हें भी इस अद्भुत युगलीला की दिव्य अनुभूति होती है।
अब जो उनके साथ आत्मीयता का सम्बन्ध बनायेंगे, उन्हें स्वयं भी उस 'रासलीला' का एक पात्र ही बनना पड़ेगा। उन्हें अपने रोम- रोम में प्रभु के वास का बोध भले न हो, किन्तु उसी समर्थ निर्देशक के निर्देशन में अपनी भूमिका निभाने का भाव तो बना ही रहेगा।
प्राणों का स्पंदन :: इसी तथ्य को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने आगे लिखा है :-
"एक वाक्य में कहा जाय तो हमारा 'प्राण स्पंदन और मिशन' एक ही कहा जा सकता है। इस तथ्य के आधार पर मिशन की विचारधारा के प्रति जिसकी जितनी निष्ठा है उन्हें हम अपने 'प्राण जीवन' का उतना ही घनिष्ठ सम्बन्धी मानते हैं। भले ही वे व्यक्तिगत रूप में हमारे शरीरगत सम्पर्क में कभी न आये हों, पर हमारी आशाभरी दृष्टि उन्हीं पर जा टिकती है।"
गुरुवर के इस कथन को हृदयंगम करते ही, उनके शरीर के साथ सम्पर्क हो पाने या न हो पाने का महत्त्व एकदम कम हो जाता है। उनके प्राण- मिशन के आदर्शों- सिद्धांतों से सम्पर्क बनने और निभाने का महत्त्व बढ़ जाता है। इस रूप में उनका सान्निध्य सदा- सभी के लिए सुलभ है। आवश्यकता उसे सही रूप में समझने और उसके प्रति समर्पण साधना करने की ही होती है। इस साधना को कैसे किया जाय? इसके लिए भी उसी आलेख में उन्होंने अपनी जीवन साधना का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है :-
"पंद्रह वर्ष की आयु में सारा जीवन जिस भगवान- जिस सद्गुरु को अर्पित किया था वह शरीर सत्ता नहीं, वरन युग चेतना की ज्वलन्त ज्वाला ही कही जा सकती है। उसके प्रभाव से हम जो कुछ सोचते और करते हैं, उसे असंदिग्ध रूप में 'भजन' कहा जा सकता है। यह भजन मानवी आदर्शों को पुनर्जीवित करने के विविध प्रयोगों के रूप में समझा जा सकता है। हमारी दैनिक उपासना भी इसी का एक अंग है। उसके माध्यम से हम अपनी सामर्थ्य पर, अन्तरात्मा पर प्रखरता की धार रखते हैं, इसीलिए उसे साधना भर कहा जाएगा। साध्य तो वह भगवान है, जिसकी झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म, सूक्ष्म शरीर में सद्ज्ञान एवं कारण शरीर में सद्भाव के रूप में भासित होती है।"
साधना करें : सफल जीवन साधना का प्रत्यक्ष उदाहरण सामने है और उसके सत्परिणाम भी प्रकट हैं। गुरुसत्ता की भूमिका स्पष्ट हो गयी। अब उस प्रकाश में अपनी भूमिका निभानी है, अपने अभ्यास को विकसित करना है। सद्गुरु और भगवान में अभेद दर्शन, उसे शरीर सत्ता नहीं, चेतन की ज्वलन्त ज्वाला के रूप में अनुभव करना, उसी की ऊर्जा से- उसी की इच्छानुसार जीवन की सारी स्थूल- सूक्ष्म गतिविधियों को संचालित होने देने की गहन साधना करना। भगवान जीवन में आये, व्यक्त हो, इसके मूल्यांकन के पैमाने भी यहाँ स्पष्ट कर दिए गये हैं।
• प्रभु जब स्थूल शरीर, शरीरगत अंगों का संचालन करेगा तब सत्कर्म ही होगा।
• वह जब सूक्ष्म शरीर के विचारों को संचालित करेगा तो सद्ज्ञान का ही उदय होगा।
• वह जब कारण शरीर की भाव संवेदनाओं को प्रवाहित करेगा तो वे जीवमात्र के लिए सद्भाव के रूप में ही प्रकट होंगी।
• जब एक ही सत्ता तीनों शरीरों का संचालन करेगी तो तीनों के बीच तालमेल बिठाने में क्या दिक्कत आयेगी? वह तो सहज हो जायेगा। भाव, विचार और कर्म की धाराएँ एक होकर जीवन को त्रिवेणी संगम जैसा तीर्थ बना देंगी।
• इस प्रकार जीवन साधना को ठीक से समझ लेने, उसके प्रति तीव्र अनुराग पैदा हो जाने और उसके आधार पर पूरी ईमानदारी एवं तत्परता से उसका अभ्यास होने पर सच्ची आत्मीयता का अनुभव तो होने ही लगेगा। इसी के साथ लघु से महान में रूपान्तरण की दिव्य प्रक्रिया का लाभ मिलने लगेगा। यही अनुभव आगे चलकर एकत्व- अद्वैत की दिव्यानुभूति तक ले जा सकता है।
शास्त्रीय स्तर पर देखें तो यह साधना बड़ी दुरूह और कठिन है। किन्तु युगऋषि ने युगधर्म से जोड़कर इसे सहज और सरल बना दिया है। गुरुसत्ता के उदाहरण से, प्रभुचेतना के साथ गहरा सम्बन्ध जोड़ने की साधना करके दुर्लभ लाभ सहज ही प्राप्त करने की तैयारी करें।
प्रामाणिक युग सृजेता बनें
अवतार चेतना हमेशा 'युग चेतना की ज्वलन्त ज्वाला' के रूप में ही उभरती और कार्य करती रही है। राम के रूप में, कृष्ण के रूप में, बुद्ध के रूप में उनके क्रियाकलाप भिन्न- भिन्न भले ही दीखते हों, किन्तु उस युग की आवश्यकता के अनुसार उन्हें 'युगचेतना की ज्वलन्त ज्वाला' के रूप में ही देखा- समझा जा सकता है। उनके द्वारा स्थापित दिव्य अनुशासनों को उस समय के युगधर्म की संज्ञा मिलती रही है। उनके अनुयायी, सहयोगियों को अपने- अपने समय के युगधर्म निभाकर ही उनकी समीपता या उनके विशेष अनुग्रह पाने का श्रेय- सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इस युग में भी वही प्रक्रिया दुहराई जानी है। युग परिवर्तन की दिव्य योजना के प्रामाणिक सहयोगी- सृजेता बनकर ही इस युग के युगावतार, दिव्य चेतन प्रवाह का भरपूर लाभ पाया जा सकता है। इसके लिए क्या क्रम अपनाना है, इसे उन्हीं की भाषा में समझें :-
"युग सृजन में छोटी- बड़ी भूमिका जिन्हें निभानी है, वे सभी सृजन सैनिक कहे जायेंगे। उनका प्रधान हथियार उनका अपना व्यक्तित्व है। यदि उसमें प्रखरता मौजूद होगी तो फिर प्रचारात्मक, सृजनात्मक और सुधारात्मक (संघर्षात्मक) जो भी काम हाथ में लिए जायेंगे, वे सभी सफल होंगे। व्यक्तित्वहीनों के लिए युग नेतृत्व का दुस्साहस करना उपाहासास्पद है। नाटक के रंगमंच (स्टेज) पर लड़ाई के पैंतरे बदलना एक बात है और रणभूमि में तलवार भवानी को बिजली की तरह चमकाना दूसरी। अभिनेता के रूप में तो वक्ता, नेता का कार्य कोई मस्खरा भी कर सकता है; किन्तु प्रभावोत्पादक परिणाम उत्पन्न कर सकना तो मात्र साहसी- शूरवीरों के लिए ही संभव हो सकता है। युग सृजन के लिए एकमात्र साधन उस पुण्य प्रयोजन को हाथ में लेने वाले प्रखर- प्रामाणिक व्यक्तित्व ही हो सकते हैं। इन दिनों सर्वोपरि आवश्यकता उन्हीं की है। "
अब जब युगऋषि के साथ चेतनात्मक आत्मीयता स्थापित करनी है तो उनकी भावनाओं के अनुरूप हमारी भावनायें होनी चाहिए। उन्हें जिस प्रकार के सहयोगी पाने की अकुलाहट है, युग सैनिकों के मन में उसी प्रकार का बनने की अकुलाहट होनी ही चाहिए। उन्हें जिनकी सर्वोपरि आवश्यकता है, हमें वैसे बनने और बनाने की साधना को सर्वोपरि मानकर अपने प्रयास- पुरुषार्थ करने चाहिए। उपासना भी अपने व्यक्तित्व को धारदार बनाने की होनी चाहिए। जीवन साधना भी प्रभुकार्य के अनुरूप ढलने की होनी चाहिए। आराधना, सेवा भी उन्हीं के भजन के अनुरूप होनी चाहिए।
प्रज्ञा परिवार :- युगऋषि ने अपने परिवार का नाम सन् ८० में पुनर्गठन प्रक्रिया के अन्तर्गत 'गायत्री परिवार' से बदलकर 'प्रज्ञा परिवार' कर दिया है। उन्हीं के शब्दों में :-
"अपने मिशन और परिवार का नामकरण गायत्री परिवार किया गया। अगले दिनों उसका स्वरूप ज्यों का त्यों रहेगा, पर बोलचाल की भाषा में 'प्रज्ञा परिवार' ही कहना उपयुक्त है। अब तक गायत्री परिवार के सदस्य गायत्री परिजन कहलाते रहे हैं, किन्तु अब उन्हें अपने समुदाय और उत्तरदायित्व का बोध कराने वाला चिर प्राचीन, किन्तु नवीन नाम 'प्रज्ञा परिजन' दिया जा रहा है।" (अखण्ड ज्योति, अक्टूबर ८०, पृ. ४८ ))
गायत्री साधना से प्रज्ञा- दूरदर्शी विवेकशीलता, आदर्शनिष्ठ विचारशीलता जागती है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने प्रज्ञा में स्थित साधक को 'स्थित प्रज्ञ' कहा गया है। अस्तु 'गायत्री परिवार' के स्थान पर 'प्रज्ञा परिवार' सम्बोधन अधिक सार्वभौम और महत्त्वबोध कराने वाला है। युगऋषि ने प्रज्ञा परिवार को तीन स्तर की जाग्रत् आत्माओं का संगठन कहा है। उन्हीं के शब्दों में देखें :-
तीन स्तर :- प्रज्ञा परिवार में तीन स्तर की जाग्रत् आत्माओं का एकत्रीकरण हुआ है। वातावरण में प्रेरणा भर सकने की दृष्टि से उपयुक्त व्यक्तियों को 'प्रज्ञापुंज' कहा जाएगा। नवसृजन के अग्रदूत- युगशिल्पी, जो परिवर्तन के महान निर्णय को अपने में उतारने और दूसरों में प्रवेश कराने के लिए प्रचंड पराक्रम करेंगे, उन्हें 'प्रज्ञापुत्र' कहा गया है। तीसरे 'प्रज्ञापरिजन' जो जनसम्पर्क और लोकसेवा के क्षेत्रों में भी अपनी विशेषताओं के कारण कुछ अधिक न कर सकेंगे, किन्तु आत्म निर्माण और परिवार निर्माण की दृष्टि से कुछ उठा भी न रखेंगे। इन तीनों में प्रज्ञापुंजों को 'विशिष्ट' प्रज्ञापुत्रों को 'वरिष्ठ' और प्रज्ञा परिजनों को 'कनिष्ठ' कहकर संबोधित किया जाता है। इन्हें मूर्धन्य, प्रखर और पराक्रमी भी कहा जा सकता है।"
हर क्षेत्र में 'प्रज्ञापुत्रों' और 'प्रज्ञापरिजनों' की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने का लक्ष्य बनाकर चलना चाहिए। गुरुसत्ता- परमात्मसत्ता के साथ क्रमश: चेतना स्तर की घनिष्ठता बढ़ाने के लिए इसी साधना में प्रवृत्त रहना चाहिए। नये परिचितों को प्रज्ञा परिजन के रूप में, परिजनों का प्रज्ञापुत्रों के रूप में विकसित करने के प्रयास इसी साधना के बल पर सफल होंगे। कालान्तर में प्रज्ञापुत्रों में से ही कुछ 'प्रज्ञापुंजों' की श्रेणी में विकसित होकर स्थूल- सूक्ष्म वातावरण को ऊर्जित- सुगंधित करने की भूमिका निभा सकेंगे। इसी क्रम में साधकगण जीवनमुक्त आत्मा के स्तर तक उठकर परम गति के अधिकारी बन सकते हैं।
जीवनमुक्त होने के शास्त्रीय विधि- विधानों के असमंजस में नहीं पड़ना चाहिए। युगऋषि के निर्देशानुसार युगधर्म की गहराई समझकर तद्नुसार जीवन साधना करने से ही परम गति प्राप्त हो सकती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है कि जो साधक जीवन भर प्रभु के निमित्त कार्य करता है, वह अंत में प्रभु का सान्निध्य ही पाता है। फिर मोक्षमूलं गुरुकृपा भी तो साथ में है।


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