भक्ति की सार्थकता भाव संवेदनाओं के उन्नयन में है

Published on 2018-07-23
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बुद्धिवाद की सीमाएँ
बौद्धिक क्षमता को किन्हीं गणितीय सूत्रों से किसी सीमा तक आँका- नापा भी जा सकता है, लेकिन स्मरण शक्ति, रचना शक्ति, लेखन, संगठन, अनुसंधान- विश्लेषण जैसी क्षमताएँ माप की परिधि में नहीं आतीं। भौतिक विज्ञानी केवल पदार्थों की स्थिति का विवेचन- विश्लेषण करते हैं, लेकिन भावनात्मक उथल- पुथल की व्याख्या करने में अपने को असमर्थ पाते हैं, जो मानव जीवन को अत्यधिक प्रभावित करती है।
चंद्रमा एक निर्जीव पिण्ड है, पर चकोर से लेकर कवियों तक पर जो भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ होती हैं, वे क्या हैं, क्यों हैं? पुष्प की व्याख्या कोई वनस्पति विज्ञानी एक पादप- अवयव के रूप में ही कर सकता है, किन्तु उसकी समीपता से दृष्टि को जो सौन्दर्य बोध होता है, एक- दूसरे को उपहार प्रस्तुत करते समय जिन भाव संवेदनाओं का आदान- प्रदान होता है, उसकी विवेचना विज्ञानी के बस से बाहर की चीज है।
तरुण नारियों में से एक के साथ पवित्र तथा दूसरी के साथ वासनात्मक दृष्टि क्यों उभरती है, इसका उत्तर शरीर विज्ञानी क्या दे सकते हैं? आदर्शों के लिए आत्मरक्षा और स्वार्थ को छोड़कर लोग त्याग- बलिदान के उदाहरण क्यों उपस्थित करते हैं, इसका उत्तर मनोविज्ञान वेत्ताओं के पास, प्राणी की मूल प्रवृत्तियों का विवेचन करने वालों के पास क्या हो सकता है?
भाव- श्रद्धा की शक्ति
मनुष्य वस्तुत: भावनात्मक स्तर पर खड़ा है। उसकी गरिमा को नापना- देखना हो तो गहराई में उतरकर देखना होगा कि किसका चिंतन और दृष्टिकोण क्या है? उसकी आस्था, निष्ठा और आकांक्षा किस केन्द्र बिन्दु पर टिकी है? मनुष्य की महानता उच्च दृष्टिकोण के आधार पर ही निर्भर है, फिर उसे भले ही अभावग्रस्त साधनों में जीवन- यापन क्यों न करना पड़े।
व्यक्ति की श्रद्धा ही है, जिसका सम्बल पाकर वह अपने आदर्शों के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहकर भी प्रसन्न ही रहा करता है। जिनकी आकांक्षा और आस्था का केन्द्र, जितना उच्च होगा, उसकी श्रद्धा उतनी ही प्रगाढ़, परिष्कृत समझनी चाहिए।
भक्ति समर्पण चाहती है
ईश्वर या धर्म के प्रति व्यक्ति की भक्ति और उसकी श्रद्धा का परिचय भी आकांक्षाओं से ही मिलता है। सच्ची और गहनतम श्रद्धा तो वह है जिसमें ईश्वर से कोई अपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि ईश्वर की अपेक्षा के अनुसार ही स्वयं को ढाला जाता है।
यदि आप सचमुच आस्तिक हैं, तो परमेश्वर को अपनी इच्छानुसार चलाने के लिए प्रयास न करें, बल्कि स्वयं ईश्वर की इच्छापूर्ति के निमित्त बनें। अब तक के उपलब्ध अनुदान कम नहीं हैं, उन पर संतोष करना चाहिए और यदि अधिक की अपेक्षा है तो बुद्धि और पुरुषार्थ के मूल्य पर उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।
ईश्वर को अपना आज्ञानुवर्ती बनाने की अपेक्षा यह उचित है कि हम ईश्वर की इच्छानुसार चलें और अपनी वासना, तृष्णाओं का ताना- बाना समेट लें। मालिक की तरह ईश्वर पर हुकुम चलाना उचित नहीं। उपयुक्त यही है कि हम उसके आदेशों को समझें और तद्नुसार अपनी गतिविधियों का पुन: निर्माण, पुन: निर्धारण करें।
आस्तिकता का अर्थ केवल ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करना ही नहीं, वरन यह भी है कि उसके निर्देशों का पालन यथावत किया जाय। उपासना का अर्थ समृद्धि और सुविधा के लिए गिड़गिड़ाना नहीं, वरन् यह है कि हमारा शौर्य सजग हो, जिसमें अंधकार में भटकते लोगों का अनुसरण छोड़कर ईश्वर के पीछे एकाकी चल सकें।
हम ईश्वर के लिए जिएँ
परमात्मा तो हमें अपनी गोद में लेने के लिए, छाती से लगाने के लिए दोनों भुजाएँ पसार कर खड़ा है। एक भुजा है पीड़ितों, पतितों और पिछड़े हुओं का क्रन्दन। दूसरी भुजा है सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की पुकार। यह निनाद दिशाओं के अन्तराल में गूँजता रहता है, बहरे कान उसे सुन नहीं पाते।
इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान के सम्मुख गिड़गिड़ाना अशोभनीय है। जो मिला है उसी का सदुपयोग कहाँ कर सके जो और अधिक माँगने की हिम्मत करें। कर्मफल भोगने के लिए हमें साहसी और ईमानदार व्यक्ति की तरह रहना चाहिए। गलती करने में जो दुस्साहस कभी दिखाया था, आज उसका एक अंश प्रस्तुत कर्मफल को भोगने में भी दिखाना चाहिए।

कर्मफल अकाट्य हैकर्मफल अनिवार्य है। उस विधान से कोई छूट नहीं सकता। स्वयं भगवान तक न छूट सके तो हम ही क्यों साहस खोकर दीनता प्रकट करें। जो सहना ही ठहरा, उसे हँसते हुए बहादुरी के साथ क्यों न सहें?
पतन और पीड़ा से ग्रसित पिछड़े हुए मनुष्य भले ही अपने अकर्म या अज्ञान का फल भुगत रहे हों, पर हमारी दृष्टि में वे नियति द्वारा इसी उद्देश्य से लाये जाते हैं कि हम सेवा, सहानुभूति, भावुकता, सहयोग द्वारा उन्हें ऊँचा उठाने, सहारा देने का प्रयास करते हुए अपनी बहुमूल्य आत्मिक चेतना को उभार सकें। दया, करुणा, उदारता, सेवा जैसी दिव्य सम्पदाओं से अपने को सुसज्जित करें। इस प्रकार के प्रयासों में जो समय, श्रम, मनोयोग एवं धन खर्च होता है, उसकी तुलना में लाखों गुने मूल्य का आत्म- बल और आत्म- संतोष मिलता है। ऐसे प्रयत्नों में हुए खर्च और परिणाम में मिले लाभ को यदि ठीक तरह तौला जा सके तो प्रतीत होगा कि जो खोया गया, उससे लाखों गुना पा लिया।
भक्ति का राजमार्ग
ईश्वर को पाने के लिए हमें अपनी ओर से कुछ नहीं करना है। केवल उसकी पसारी हुई भुजाओं में प्रवेश करना है। उसके आमंत्रण को स्वीकार करना भर ईश्वर मिलन का प्रयोजन पूरा करने में पर्याप्त है।
जिसने ईश्वर की भावनात्मक पुकार सुन ली, उसका जीवन धन्य हो गया। जिसने पतितों- पीड़ितों के क्रंदन और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन आह्वान के रूप में फैली ईश्वर की भुजाओं का आमंत्रण स्वीकार कर लिया, वही भक्त है, उसी की भक्ति में शक्ति होती है।


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