छोड़ो सुविधाओं की होड़, महाकाल से लो नाता जोड़

Published on 2018-07-30
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आज की विडंबना
आज के तथाकथित बुद्धिमान इन दिनों की समस्याओं और आवश्यकताओं को तो समझते हैं, पर उपाय खोजते समय यह मान बैठते हैं कि यह संसार मात्र पदार्थों से सजी पंसारी की दुकान भर है। इसकी कुछ चीजें इधर की उधर कर देने, अनुपयुक्त को हटा देने और उपयुक्त को उस स्थान पर जमा देने भर से काम चल जायेगा।

इन दिनों समूचे प्रयास इसी दृष्टि से बन और चल रहे हैं। वायु प्रदूषण दूर करने के लिए कोई ऐसी नई गैस खोजने का प्रयत्न हो रहा है, जो हवा में भरते जा रहे विष को चूस लिया करे। खाद्यान्न की पूर्ति के लिए खादों के ऐसे भीमकाय कारखाने खुल रहे हैं जो एक के दस पौधे उगा दिया करे। पर मूल कारण की ओर ध्यान न जाने से अभाव, असंतोष एवं विग्रह किस प्रकार निरस्त होगा, इसे सोचने की न जाने क्यों किसी को फुरसत नहीं है।

चोट की मरहम- पट्टी की जा सकती है, पर समस्त रक्त में फैले हुए 'रक्त कैंसर' को मरहम- पट्टी से कैसे ठीक किया जाए? एक दिन तो कोई किसी को मुफ्त में भी रोटी खिला सकता है, पर आये दिन की आवश्यकताएँ तो हर किसी को अपने बलबूते ही हल करनी पड़ेंगी। उसके लिए किसी भी दानवीर के सदावर्त भण्डार में सभी लोगों का गुजारा चलता रहे, यह संभव नहीं।

महाक्रान्ति की वेला
वस्तुत: मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बुरी तरह गड़बड़ा गया है। उसकी स्थिति तो विक्षिप्तों जैसी हो गई है, उसी से ऐसे ऊटपटांग काम होने लगे हैं, जिनके कारण अपने और दूसरों के लिए विपत्ति ही विपत्ति उत्पन्न हो गई है। पगलाये हुए व्यक्ति द्वारा की गई तोड़- फोड़ की मरम्मत तो होनी ही चाहिए, पर साथ ही उस उन्माद की रोकथाम भी होनी चाहिए, जिसने भविष्य में भी वैसी ही उद्दण्डता करते रहने की आदत अपनाई है।

यहाँ यह तथ्य भी स्मरण रखने योग्य है कि सामान्यजन अपनी निजी समस्याओं को ही किसी प्रकार सँभालते, सुधारते रहते हैं, पर व्यापक विपत्ति से मिलजुलकर ही निपटना पड़ता है। बाढ़ आने, महामारी फैलने जैसे अवसरों पर सामूहिक योजनाएँ काम देती हैं। पुरातन भाषा में ऐसे ही महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को युग परिवर्तन अथवा अवतार अवतरणों जैसे नामों से पुकारा जाता रहा है। ऐसे तूफानी परिवर्तनों को महाक्रान्ति भी कहते हैं। क्रान्तियाँ प्रतिकूलताओं से निपटने के लिए संघर्ष रूप में उभरती हैं। पर महाक्रान्तियों को दूरगामी योजनाएँ बनानी पड़ती हैं। अनीति के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने के साथ- साथ नवसृजन के निर्धारण करने एवं कदम उठाने पड़ते हैं। इस अपने समय में अदृश्य में पक रही खिचड़ी को महाक्रान्ति के रूप में जाना जाय और युग परिवर्तन कहा जाय, इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना जैसा कुछ नाम दिया जाय, तो भी कोई हर्ज नहीं।

भविष्य उज्ज्वल है

अत्यधिक विशालकाय सुविस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करने वाले ६०० करोड़ मनुष्यों के चिन्तन को अवांछनीयता से विरत करके वांछनीयता के साथ जोड़ देने वाले कार्य को कोई एक व्यक्ति न कर सकेगा; पर इस तथ्य पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। ऐसे अवसर भूतकाल में भी अनेक बार आये हैं। जब मनुष्य निराश होने लगते हैं, तब उनमें नये सिरे से, नई हिम्मत भरने के लिए प्रभातकाल के अरुणोदय की तरह नये तूफानी प्रवाह उदय होते रहे हैं, जिनके लिए बड़ी उथल- पुथल भी असंभव नहीं होती।

स्रष्टा की सत्ता और क्षमता पर जिन्हें विश्वास है, उन्हें इसी प्रकार सोचना चाहिए कि गंदगी कितनी ही कुरुचिपूर्ण क्यों न हो, वह तूफानी अंधड़ के दबाव और मूसलाधार वर्षा के प्रवाह के सामने टिक नहीं सकेगी। बिगाड़ रचने में मनुष्य ने अपनी क्षुद्रता का परिचय कितना ही क्यों न दिया हो, पर इस सुन्दर भूलोक के नन्दनवन का संस्थापक उसे इस प्रकार वीरान न होने देगा, जैसा कि कुचक्री उसको विस्मार कर देने के षड्यंत्र रच रहे हैं। अनाचारियों की करतूतें निश्चय ही रोमांचकारी होती हैं, पर विश्व को संरक्षण देने वाली ऐसी देव सत्ताएँ भी सर्वथा निष्क्रिय नहीं, जिनको सृष्टि का संतुलन बनाये रहने का काम सौपा गया है।

युगावतार की पुकारईश्वर- विश्वासी जानते हैं कि भगवान का अनुग्रह जहाँ साथ है, वहाँ असमंजस जैसी कोई चीज शेष नहीं रह जाती। जब आवेश की ऋतु आती है तो जटायु जैसा जीर्ण- शीर्ण भी रावण जैसे महायोद्धा के साथ निर्भय होकर लड़ पड़ता है। गिलहरी श्रद्धामय श्रमदान देने लगती है और सर्वथा निर्धन शबरी अपने संचित बेरों को देने के लिए भाव- विभोर होती है। सुदामा को भी तो अपनी चावल की पोटली समर्पित करने में संकोच बाधक नहीं हुआ था। यह अदृश्य में लहराता दैवी- प्रवाह है, जो नवसृजन के देवता की झोली में समयदान, अंशदान ही नहीं, अधिक साहस जुटाकर हरिश्चन्द्र की तरह अपना राजपाट और निज का, स्त्री- बच्चों का, शरीर तक बेचने में आगा- पीछा नहीं सोचता। दैवी आवेश जिस पर भी आता है, उसे बढ़- चढ़ कर आदर्शों के लिए समर्पण कर गुजरे बिना चैन नहीं पड़ता।

यही है महाकाल की वह अदृश्य अग्नि शिखा, जो चर्मचक्षुओं से तो नहीं देखी जा सकती है, पर हर जीवन्त व्यक्ति से समय की पुकार कुछ महत्त्वपूर्ण पुरुषार्थ कराये बिना छोड़ने वाली नहीं है। ऐसे लोगों का समुदाय जब मिल- जुलकर अवांछनीयताओं के विरुद्ध निर्णायक युद्ध छेड़ेगा और विश्वकर्मा की तरह नई दुनिया बनाकर खड़ी करेगा, तो अंधे भी देखेंगे कि कोई चमत्कार हुआ। पतन के गर्त में तेजी से गिरने वाला वातावरण किसी वेधशाला से छोड़े गए उपग्रह की तरह ऊँचा उठ कर अपनी नियत कक्षा में द्रुतगति से परिभ्रमण करने लगेगा।

फिर क्या होगा? उत्तर एक ही है- विचार परिवर्तन, करुणा से ओतप्रोत भाव संवेदना, व्यक्तित्त्वों में संयम और कार्यक्रमों में आदर्शवादी पराक्रम। बस इतने भर नवगठन से अपनी दुनिया का काम चल जाएगा। उससे वे सभी समस्याएँ, जो इन दिनों सुरसा, सिंहका, ताड़का और सूर्पणखा जैसी विकरालता धारण किए हुए हैं, अपना अस्तित्व गँवाती चली जाएँगी।

बदलाव! बदलाव!! बदलाव!!!
लगता है, विश्व- चेतना ने अपनी रीति- नीति और दिशा- धारा में उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकने वाले सभी तथ्यों का परिपूर्ण समावेश कर लिया है। उसी का उद्घोष दसों दिशाओं में गूँज रहा है। उसी की लालिमा का आभास अन्तरिक्ष के हर प्रकोष्ठ में परिलक्षित हो रहा है। न जाने किसका पांचजन्य बज रहा है और एक ही ध्वनि नि:सृत कर रहा है- बदलाव! बदलाव!! बदलाव!!! उच्च स्तरीय बदलाव, समग्र बदलाव। यही होगी अगले समय की प्रकृति और नियति। मुनष्यों में से जिनमें भी मनुष्यता जीवित होगी, वे यही सोचेंगे, यही करेंगे। उसकी परिवर्तन प्रक्रिया अपने आप से आरंभ होगी और परिवार- परिकर को प्रभावित करती हुई समूचे समाज को महाकाल के अभिनव निर्धारण से अवगत और अनुप्राणित करेगी।


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