Published on 2018-08-28
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जागरूक रहें, प्रवाह में न बहें
मानव जीवन ईश्वर की एक अनमोल अमानत है। इसे आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाना ही अपनी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का परिचय देना है। भगवान ने हमारी पात्रता की कसौटी के रूप में यह मनुष्य शरीर दिया है और यह परखा है कि हम इसका उत्तरदायित्व संभालने की स्थिति में हैं या नहीं? यदि इस कसौटी पर खरे उतरे तो ऋषित्व एवं देवत्व जैसे उच्च उत्तरदायित्व प्रदान कर अंतत: अपना ही अंग बना लेता है, पर यदि मनुष्यत्व जैसी परीक्षा में सफल न हो सके तो जिस स्तर के हम हैं, उसी निम्न योनि में पड़े रहने के लिए वापिस भेज देता है।

अस्तु, प्रयत्न यह होना चाहिए कि मानव के महान् उत्तरदायित्व को वहन करने के लिए हम पग- पग पर सतर्कता बरतें। निम्न योनियों के संचित कुसंस्कारों को हटायें और मानवोचित गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करें।

यह प्रयत्न तभी सफल हो सकता है जब हर घड़ी अपने आपके ऊपर चौकसी रखी जाय। अपने सम्बन्ध में असावधान रहने से उसी ढर्रे पर अपनी गाड़ी भी लुढ़कने लगती है जिसमें आसपास घिरे हुए निकम्मे लोगों का जीवन फूहड़पन के साथ बर्बाद होता चला जा रहा है। आवश्यकता ऐसी विवेकशीलता की है जो अपने सम्बन्ध में सतर्कता बरतने और दूसरे गन्दे लोगों का अनुकरण न करके अपना मार्ग स्वत: निर्धारत करने का साहस प्रदान कर सके।

साहसी कदम बढ़ायें

ऐसा साहस ही अध्यात्म है जो आदर्श जीवन जीने की गतिविधियों का निर्माण करे, उसी रास्ते पर उत्साहपूर्वक घसीट ले चले। जिन लोगों के बीच हमारा रहना है उनमें से अधिकांश बड़े स्वार्थी, संकीर्ण, ओछे, गंदे लोग हैं, इनकी कोशिश अपने ही ढर्रे पर साथियों को भी घसीट ले चलने की होती है। वे उत्कृष्ट जीवन जीने वालों का मजाक बनाते हैं। निन्दा और विरोध करते हैं और तरह- तरह की अड़चनें खड़ी करते हैं।

जो इनसे डर गया, वह गन्दा जीवन जीने के लिए विवश होगा, पर जिसने साहस करके अपना पथ स्वयं निर्धारित करने का संकल्प कर लिया और पड़ौसियों की उपेक्षा करके उत्कृष्टता की गतिविधियाँ अपनाने के लिए दृढतापूर्वक चल पड़ा, वही जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है। अध्यात्म साहसी शूरवीरों का, आदर्शवादी और उत्कृष्ट लोगों का मार्ग है।

जो जीवन शोधन का पुरुषार्थ कर सकने का साहस नहीं कर सकते, उन्हें आत्मिक प्रगति, ईश्वर की प्रसन्नता और उन दिव्य विभूतियों की आशा नहीं करनी चाहिए, जिन्हें पाकर मनुष्य जीवन धन्य और सार्थक बनता है। कीमती वस्तुएँ उचित मूल्य देकर ही खरीदी जा सकती हैं। आध्यात्मिक विभूतियाँ और दैवी सम्पदाएँ जीवन- शोधन से कम मूल्य पर आज तक न कोई खरीद सका है और न भविष्य में कोई खरीद सकेगा।

देवी- देवताओं को मंत्र- तंत्र से सिद्ध कर उनसे तरह- तरह की मनोकामनाएँ सहज ही प्राप्त कर लेने के सपने देखने वाले, थोड़ी- सी टण्ट- घण्ट के बदले स्वर्ग- मुक्ति लूट ले जाने वाले धूर्त अपना मन सस्ते सपने देखने में बहलाते रहते हैं, पर रहना उन्हें खाली हाथ ही पड़ता है। सस्ते मूल्य पर आत्मिक सफलताएँ मिलने के प्रलोभन विडम्बना भर हैं। उनसे हर विवेकशील को अपना पिण्ड शीघ्र ही छुड़ा लेना चाहिए और साहसपूर्वक जीवन- शोधन के उस राजमार्ग पर चल पड़ना चाहिए, जिस पर चले बिना कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं हो सकता।

आत्मशोधन की प्रक्रिया

यह कार्य एक निर्धारित समय पर थोड़ी पूजा- उपासना जैसी प्रक्रिया अपनाकर सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इसके लिए हर घड़ी अपने ऊपर आत्म- निरीक्षण की दृष्टि रखनी होती है। साधना के प्रथम चरण द्वारा अपने शरीर और मन पर, कार्य और विचारों पर बारीकी से नजर रखकर यह देखना होता है कि मनुष्यता को गिराने वाले पशु स्तर के कुसंस्कार अपने में कितने समाये हुए हैं? गुण, कर्म, स्वभाव में किन पशु- प्रवृत्तियों का समावेश है? उन्हें धीरे- धीरे, एक- एक करके छोड़ने का संकल्प करना चाहिए। अपने कुसंस्कारों से लड़ना चाहिए। उनकी हानियों पर विचार करना चाहिए और एक- एक करके अपने दोष- दुर्गुणों को छोड़ते चलना चाहिए।

आहार- विहार सम्बन्धी कितनी ही कुटेव अपने अन्दर हो सकती हैं। नशे, व्यसन, व्यभिचार, आलस्य, कटु भाषण, क्रोध, आवेश, असंयम, मलीनता, लापरवाही, आशंका, चिन्ता, भय, कायरता, निराशा, उच्छ्रंखलता जैसे छोटे- मोटे स्वभावजन्य दोष ऐसे होते हैं, जो देखने में मामूली से लगते हैं, पर प्रगति के पथ पर भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं।

चोरी, हत्या, धोखा, बेईमानी, बलात्कार जैसे बड़े पाप तो कोई बिरले ही करते हैं, उनके लिए कानून- दंड व्यवस्था भी है, पर छोटे दुर्गुणों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। असल में पतन की जड़ यही होते हैं और आगे चलकर उन्हीं की वृद्धि होती चलने से व्यक्ति क्रूर- कुकर्मी, नर- पिशाच बन जाता है। इसलिए इन विष- वृक्षों के छोटे- मोटे पौधे भी अपने जीवन क्षेत्र में उग रहे हों तो उन्हें एक- एक करके फेंकते चलने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

अपने दैनिक क्रिया- कलाप और उनके साथ जुड़े हुए विचारों एवं उद्देश्यों को परखते रहना चाहिए कि वे निकृष्ट स्तर के, नर- पशुओं के स्तर पर तो नहीं चल रहे हैं? यदि इनमें दोष पाये जायें तो तुरन्त उसके स्थान पर सुधरी हुई रूपरेखा उपस्थित करनी चाहिए और दोष के स्थान पर गुण को, अनुपयुक्त के स्थान पर उपयुक्त को प्रतिष्ठित करना चाहिए। जो ग़लत किया जा रहा है, उसके स्थान पर सही क्या हो सकता है, यह निर्णय करने के लिए पक्षपातरहित विवेक की आवश्यकता है।

पक्षपात नहीं, न्याय निष्ठा

आमतौर से हर मनुष्य अपने साथ रियायत और पक्षपात करता है। यह भूल सुधारनी चाहिए। जैसे ग़लत विचार या ग़लत काम हम करते हैं, यदि वैसे ही कोई दूसरा करे और पूछने आये कि मुझे इन्हें कैसे छोड़ना चाहिए? और इनके स्थान पर क्या रीति- नीति अपनानी चाहिए? तो इसके उत्तर में हम निश्चित ही बहुत कुछ उपदेश और परामर्श दे सकते हैं। वही उपदेश और परामर्श अपने को भी देना चाहिए।

अपने भीतर एक नया न्यायाधीश, उपदेशक, गुरु, भगवान विकसित कर लेना चाहिए। वही अपना सुधार और मार्गदर्शन कर सकता है। उसी के परामर्श पर चलना चाहिए। इसी प्रकार एक- एक करके अपने दोष- दुर्गुणों का अन्त होगा। आत्म- शोधन को एक महान साधना मानकर उसमें निरन्तर संलग्न रहने से ही हम निर्मल, निर्दोष, निष्पाप और निष्पक्ष, सद्विवेकी महामानव बन सकेंगे। आध्यात्मिक प्रगति के लिए यही राजमार्ग है।


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