Published on 2018-09-25 HARDWAR
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इसका मनोवैज्ञानिक, आत्मिक महत्त्व समझें, श्राद्ध करें, लाभ पायें

आत्मवादी जीवन दर्शन
आत्मवादी जीवन दर्शन भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। भारतीय ऋषियों- मनीषियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से जीवन की गहराइयों को समझा। सतत परिवर्तनशील काया के पीछे जीवन प्रवाह की निरन्तरता अनुभव की। नश्वर प्राणियों के अन्दर अनश्वर आत्म चेतना को पहचाना। उसी आधार पर रंग- रूप, रुचि- स्वभाव, आहार- विहार आदि की भिन्नताओं को देखा, विशेषताओं का मूल्यांकन भी किया। साथ ही परस्पर के संवेदनात्मक जुड़ाव का मर्म भी जाना। इसीलिए उन्हें प्रकृति के विभिन्न घटक परस्पर एक- दूसरे के पूरक दिखने लगे। इसी अनुभूति ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' तथा 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के तथ्यों का उद्घोष किया। इसी आधार पर भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति का सम्मान पाती रही।

उक्त जीवन दर्शन ने मनुष्य को अपने सर्वश्रेष्ठ होने के घातक अहंकार से बचाया। अपनी विकसित चेतना के नाते अविकसितों को विकसित करने तथा उनके विकसित होने के अनुपम लाभ उठाने का (परस्परं भावयन्तां) का क्रम हजारों वर्ष चलता रहा। जहाँ एक- दूसरे का सम्मान हो, एक- दूसरे के प्रति कृतज्ञता का भाव हो, वहाँ न कोई शोषक बनने की अहंता का शिकार होता है और न कोई शोषित होने की दीनता- हीनता से पीड़ित होता है। सभी सभी के साथ संवेदनात्मक स्तर पर जुड़कर सुख बाँट देने और दु:ख बँटा लेने के लिए तत्पर हो जाते हैं। स्वर्ग या सतयुगी वातावरण इसी आधार पर बनता और विकसित होता रहता है। पूर्वकाल में भी ऐसा हुआ है और भविष्य में भी ऐसा संभव है।

परमात्मा ने इस सृष्टि को जड़- चेतन एवं गुण- दोष के समन्वय से रचा है। मनुष्य के अन्दर बीज रूप में सत्प्रवृत्तियाँ- दुष्प्रवृत्तियाँ रहती हैं। वे किसी विशेष अनुशासन, वातावरण में पनपती- पुष्ट होती हैं। ऋषियों- मनीषियों ने इसीलिए विभिन्न सत्प्रवृत्तियों को विकसित- पोषित करने योग्य वातावरण तैयार करने के लिए पर्वों की परम्परा बनायी। आज भी विभिन्न सद्विचारों, सत्प्रवृत्तियों के विकास का महत्व समझाने और वातावरण बनाने के लिए राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दिवस मनाये जाते हैं।

कृतज्ञता ज्ञापन पर्व
विभिन्न सत्प्रवृत्तियों को उभारने के लिए अधिकतर एक दिवसीय पर्व होते हैं। कुछ २- ३ दिवसीय भी होते हैं। आत्मशक्ति विकसित करने के लिए नवरात्र पर्व ९ दिन के होते हैं। इसी क्रम में 'कृतज्ञता' का भाव जगाने, पुष्ट बनाने, उसका वातावरण बनाने के लिए १५ दिवसीय पर्व मनाने का विधान बनाया गया है, जिसे 'पित्रपक्ष' कहते हैं।

पित्रपक्ष :- यह पर्व हर वर्ष भारतीय पंचांग के अनुसार भाद्रपद (भादों) माह की पूर्णिमा से आश्विन (क्वार) माह की अमावस्या तक मनाया जाता है। इस साल यह २४ सितम्बर से ८ अक्टूबर तक पड़ रहा है। सामान्य मान्यता यह है कि इस अवधि में अपने पूर्वजों- पितरों को तृप्त- तुष्ट करने, उन्हें सद्गति दिलाने के लिए किए गए प्रयोग विशेष रूप से फलित होते हैं। जिस तिथि को जिस पूर्वज ने देह त्यागी, उसी तिथि को उनके निमित्त तर्पण, पिण्डदान, अन्नदान, वस्तुदान आदि पुण्य कर्म किए जाते हैं। मान्यता यह है कि ऐसा करने से पितरों की सद्गति के द्वार तो खुलते ही हैं, तृप्त- तुष्ट होकर वे श्राद्ध करने वालों को विशेष आशीर्वाद- अनुदान भी देते हैं।

इस प्रकरण में व्यक्तियों में दो तरह के भिन्न- भिन्न विचार पाये जाते हैं। बड़ी संख्या में कथित श्रद्धालु परम्परागत कर्मकाण्ड किसी प्रकार पूरा कर लेने भर से पितरों की सद्गति और अपने सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होने का विचार रखते हैं। अपनी परिस्थिति और मन:स्थिति के अनुरूप श्राद्धकर्म करने के प्रयास करते हैं। दूसरा वर्ग इसे कर्मकाण्ड तक सीमित अन्धविश्वासपूर्ण ढकोसला कहकर उसके प्रति उपेक्षा- उपहास के भाव प्रकट करता है। दोनों ही वर्ग के व्यक्तियों को ऋषियों द्वारा स्थापित इस पर्व के गहन मनोविज्ञान एवं आत्म विज्ञान का बोध होना चाहिए। तभी वे इस महत्त्वपूर्ण पर्व का लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच सकते हैं।

मनोविज्ञान
की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ प्रयोग है। कृतज्ञता का भाव मनुष्य और मनुष्य के बीच, मनुष्य और प्रकृति के विभिन्न घटकों के बीच संवेदनात्मक, मित्रतापूर्ण सम्बन्ध विकसित करता है। इसी के अभाव में संतानें अपने माता- पिता, बुजुर्गों के प्रति उदासीन, संवेदनहीन व्यवहार करने लगती हैं। समाज के विभिन्न वर्ग इसके अभाव में घातक अहंकार के शिकार हो जाते हैं। उनके क्रियाकलाप एक- दूसरे के लिए कष्टकारक बन जाते हैं। सामाजिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है। इसी के अभाव में मनुष्य अन्य प्राणियों, जीव- जन्तुओं, प्रकृति के विभिन्न घटकों को अपने उपभोग की सामग्री मानकर उनका अन्धाधुन्ध दोहन- शोषण करने लगता है। प्रकृति का सन्तुलन (इकोलॉजिकल बैलेन्स) बिगड़ने लगता है। यह भाव विकसित होते ही सब एक- दूसरे के प्रति संवेदनशील, पूरक बनकर अपनी- अपनी मर्यादा में रहकर सहयोगपूर्वक सुख- संतोषप्रद जीवन जीने लगते हैं।

पित्रपक्ष में के कर्मकाण्ड को ध्यान से देखें तो उसमें अपने पितरों के अलावा देवशक्तियों, ऋषियों, आदि पितरों, जीव- जन्तुओं, वृक्ष- वनस्पतियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए उनको तुष्ट- संतुष्ट करने के क्रम समाहित रहते हैं। अस्तु निर्धारित कर्मकाण्डों को यंत्रवत् पूरा न करके उन सभी के सहयोग से जीवन क्रम आगे बढ़ने के तथ्य को समझते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए विराट प्रकृति के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करते रहने के विचारों के साथ उन्हें सम्पन्न किया जाना चाहिए।

क्रिया से भावना एवं भावना से क्रिया के पोषण का मनोवैज्ञानिक तथ्य भली प्रकार समझना और स्वीकारना चाहिए। सम्मान के भाव होने पर अभिवादन करने का मन होता ही है और नियमित अभिवादन करने से स्नेह- सम्मान के भाव पुष्ट होते हैं। राष्ट्रीय भावना से राष्ट्रीय ध्वज को फहराने और उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने में रस आता है तो इस प्रक्रिया से जो वातावरण बनता है, उससे लोगों में राष्ट्रीय भावना विकसित- पुष्ट होती है। यह विकसित भावना अनेक सत्कर्मों- सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है। इस संदर्भ में युगऋषि ने लिखा है

दिवंगतों के प्रति श्रद्धा- सद्भाव व्यक्त करने का उपचार श्राद्ध- तर्पण है। माना गया है कि इस आधार पर स्वर्गीय स्वजनों की श्रद्धायुक्त सहायता की जा सकती है। यह मान्यता कृतज्ञता की दृढ़ पोषक है। यह पूर्वजों के उपकारों का प्रत्युत्तर देने के लिए अवसर प्रदान करती है, साथ ही इस आधार पर जाग्रत् हुई सद्भावना का उपयोग लोकमंगल के प्रयोजनों में भी बन पड़ता है। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/४३- ४६)

इसी दृष्टि से श्राद्ध कर्म के साथ सत्प्रयोजनों के लिए धनदान, अन्नदान, वस्तुदान की परम्परा भी है। आजकल लोग उसके मर्म को न समझकर केवल रूढिवादी क्रम ही अपनाते हैं। श्राद्धकर्मियों को दान के सही विधान को समझाना और अपनाना भी चाहिए।

दान का विज्ञान- विधान समझें
दान के सम्बन्ध में यक्ष एवं धर्मराज के बीच हुई वार्ता में एक बड़ा महत्त्वपूर्ण सूत्र दिया गया है। यज्ञ ने पूछा, "सर्वश्रेष्ठ दान क्या है? (दानं परं किं?)" युधिष्ठिर का उत्तर है- "सुपात्रदत्तं। अर्थात् सुपात्र को दिया गया दान ही सर्वश्रेष्ठ है।" उन्होंने किसी वस्तु विशेष का नाम न लेकर उसे प्रयोग विशेष से ही जोड़ा। इसी भाव को स्पष्ट करते हुए युगऋषि ने लिखा है -

दान सदुद्देश्यों की पूर्ति के लिए दिया जाता है। उसकी सार्थकता सत्प्रवृत्ति संवर्धन में मानी गयी है। अस्तु श्राद्धकर्म में दान की प्रक्रिया किसी वंश या वेष विशेष के मनुष्यों को व्यर्थ ही भोजन कराने, पैसा देने से सम्पन्न नहीं हो सकती। वे ही दान के अधिकारी हैं जो सच्चरित्र, विशाल हृदय हों, अथवा विपत्ति में फँसे हों और अपने पैरों पर खड़े हो सकने में असमर्थ हों। अथवा उन्हें दान लेने का अधिकार है जो सर्वतोभावेन समाज सेवा के लिए समर्पित हों। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/५०- ५४)

पहले सर्वतोभावेन समाज को समर्पित लोकहित में रत साधकों को ब्राह्मण एवं साधु कहा जाता था। वे व्यक्ति नहीं, एक मिशन के रूप में सक्रिय रहते थे। इसलिए श्राद्धकर्म में उन्हें भोजन कराने एवं वस्तुदान, धनदान देने की परम्परा डाली गई थी। अब वैसे व्यक्ति मुश्किल से ही मिलते हैं। लेकिन अधिकतर कथित श्रद्धालु उन्हीं वेशधारियों को ही दान देते हैं। वे उसका चाहे जैसा प्रयोग- उपयोग करें। ध्यान रहे दान का पुण्य दान देने भर से नहीं, उसके सही नियोजन के आधार पर मिलता है। इस संदर्भ में युगऋषि ने लिखा है-

वस्तुत: दान तो सत्प्रयोजनों के लिए प्रामाणिक हाथों में ही सौंपा जाना चाहिए। अन्यथा श्राद्ध पितरों के लिए उलटा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। उनके निमित्त किया हुआ शुभ कर्म यदि कुपात्र के हाथों या अवाञ्छनीय कृत्यों में नियोजित हो तो उन पितरों को दु:ख होना स्वाभाविक है, जिनके लिए वह किया गया। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/५६- ५८)

उक्त सिद्धांत को समझकर दान की रूढ़िवादी लकीर पीटने से बचा जाय और उसके सदुद्देश्यों में लगाने के विवेकपूर्ण क्रम अपनाये जायें, जिससे पितरों को भी प्रसन्नता हो और अपना भी कल्याण हो।

ऋणमुक्त हों, पुण्य कमायें
यदि बड़ों के प्रति वास्तव में कृतज्ञता का भाव हो तो उन्हें तृप्त करने के लिए उनके जीवित रहते ही प्रभावी प्रयास किए जाने चाहिए। जीवित बुजुर्गों की आवश्यकताओं और भावनाओं की तो उपेक्षा करना और उनके मरने पर श्राद्धकर्म की लकीर पीटकर उन्हें संतुष्ट करने और अपने लिए पुण्य अर्जित करने की बात सोचना हास्यास्पद है। उन्हें तृप्त- तुष्ट करने के प्रयास उनका शरीर रहते भी करने चाहिए और मरणोपरान्त भी।

भारतीय संस्कृति के अनुसार संतानों को स्वयं समर्थ बनने तक ही अभिभावकों की सम्पदा का उपयोग करना चाहिए। उसके बाद पितरों की शेष सम्पदा उन्हीं के निमित्त सत्कार्यों में लगा देनी चाहिए। स्वयं अपना निर्वाह अपनी मेहनत और कौशल की कमाई से करना चाहिए। इस संदर्भ में युगऋषि ने लिखा है-

संतानों को अभिभावकों के अनुदान तभी तक लेने चाहिए जब तक स्वयं समर्थ न हों। समर्थ होने पर संतानों को चाहिए कि पूर्वजों का उपार्जित धन उन्हीं की पुण्य सम्पदा बढ़ाने के लिए लौटा दें। प्रत्युपकार की यह शालीन परम्परा है। इसी से आत्मा प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त करती है। जीवित पूर्वजों को उनके द्वारा किए गये सहयोग और दिये गये अनुदानों को वापिस किया जाना चाहिए। सुपात्र संतानें अपने वयोवृद्ध अभिभावकों की सेवा- सहायता करके उऋण होने का प्रयास करती हैं। उनका स्वर्गवास हो जाने पर उनके निमित्त पुण्य कार्य करके भी ऋणमुक्त होने का अवसर मिलता है। न लौटाने पर वह ऋण अगले जन्मों में भार ढो- ढोकर चुकाना पड़ता है। (प्रज्ञोपनिषद ४/५/५९- ६५)

भारतीय संस्कृति के उक्त मूल्यवान सूत्रों को समझकर- अपनाकर विवेकपूर्वक पित्रऋण चुकाना चाहिए। लेकिन अपने प्रयास यहीं तक सीमित नहीं रहने देने चाहिए, अपनी पुण्य सम्पदा, दैवी सम्पदा बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। देवशक्तियों एवं प्रकृति के विभिन्न घटकों का उपकार समझते हुए उनके प्रत्युपकार के रूप में संकल्पपूर्वक अपने तन- मन का कुछ अंश श्रेष्ठ प्रयोजनों में लगाना चाहिए। इस संदर्भ में युगऋषि का स्पष्ट कथन है-

अपने श्रद्धा- सद्भाव के नाते पूर्वजों का ऋण चुकाने के अतिरिक्त भी लोकमंगल के लिए जितना बन पड़े शुभ कृत्य करते रहना चाहिए। इसके लिए न केवल साधनों का दान किया जाय, वरन् श्रमदान भी नियोजित किया जाय। तर्पण, श्रमदान- स्वेदबिन्दुओं का भी प्रतीक है। वृक्षारोपण, शिक्षा संवर्धन, स्वच्छता- सुव्यवस्था जैसे कृत्यों में किया हुआ श्रम भी तर्पण होता है। लोकमानस के परिष्कार में लगाया गया धन- श्रम भी श्राद्ध ही होता है। (प्रज्ञो. ४/५/६८- ७१)

यह जरूरी नहीं कि श्राद्ध कर्म को पित्रपक्ष तक ही सीमित रखा जाय। उक्त उद्धरण में ऋषि स्पष्ट करते हैं कि सभी सत्कर्म श्राद्धभाव से, कृतज्ञता के भाव से किए जायें तो वे भी पूर्वजों और प्रकृति की चेतन धाराओं को तृप्त करने वाले होते हैं। उन्हें करने वालों को दोहरा लाभ मिलता है।

इसी क्रम में प्रज्ञोपनिषद ४/५/७९- ८० में युगऋषि ने श्राद्धकर्म करने के अधिकार की व्यापकता पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार पुत्रों की तरह पुत्रियाँ भी श्राद्ध कर सकती हैं। छोटों द्वारा बड़ों के लिए, बड़ों द्वारा छोटों के, मित्रों, शुभचिंतकों, महामानवों सभी के निमित्त श्राद्ध किए जा सकते हैं। इसकी फलश्रुति बतलाते हुए युगऋषि ने लिखा है-

इससे आत्मा की अमरता के भाव को बल मिलता है। लोक- परलोक के बीच सघन सम्बन्ध बना रहने से परिवार की विशालता अक्षुण्ण बनी रहती है तथा समस्त ब्रह्माण्ड एक परिवार बन जाता है।

अस्तु श्राद्धकर्म से कृतज्ञता का भाव बढ़ने से होने वाले अनेक हितों को दृष्टिगत रखकर इस पर्व का भरपूर लाभ उठाना चाहिए।


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