Published on 2018-09-29
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धर्मतंत्र से मानव का भावनात्मक परिष्कार

धर्मतंत्र की सामर्थ्य
मानव जाति की भौतिक आवश्यकताएँ और समस्याएँ स्वल्प हैं। उन्हें बुद्धिमान मानव प्राणी आसानी से हल कर सकता है। जिस विभीषिका ने अगणित गुत्थियाँ उलझा रखी है, वह भावनात्मक विकृति ही है। मनुष्य का आंतरिक स्तर गिर जाने से उसने पशु एवं पिशाच वृत्ति अपना रखी है। इसी से पग- पग पर कलह और क्लेश के आडंबर खड़े दिखाई पड़ते हैं। यदि भावनात्मक उत्कृष्टता संसार में बढ़ जाए तो हर मनुष्य देवताओं जैसा महान दिखाई दे और सर्वत्र स्वर्गीय सुख- शांति का वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।

भावनात्मक परिवर्तन धर्मतंत्र के माध्यम से ही होना संभव है। भय और आतंक के बल पर अधिनायकवाद द्वारा लोगों को किसी मार्ग पर चलने के लिए विवश किया जा सकता है, पर इस प्रकार उसकी भावना बदलना संभव नहीं। उत्पीड़न के भय से लोगों के शरीर ही मर्यादित काम करने लगते हैं, मन नहीं बदलता। भीतर छिपा हुआ चोर अवसर पाते ही उभर आता है और अधिक ज़हरीला डंक मारता है। अच्छा तरीका यही है कि आदर्शवाद की उत्कृष्टता से श्रद्धा, धर्म और ईश्वर में सच्ची आस्था उत्पन्न कर जनसाधारण को कर्त्तव्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, समाजनिष्ठ बनाया जाए।

भावनाशीलों की भूमिका
यह कार्य राजनीतिक लोगों का नहीं। उन्हें पग- पग पर कूटनीति अपनानी पड़ती है। फलस्वरूप लोग उन्हें प्रतिभावान तो मानते हैं, लेकिन आदर्शवान नहीं। राजनीति में गाँधी जैसे संत कोई विरले ही होते हैं। शेष तो दिन- रात हेरफेर चलाने वाले होते हैं। इसलिए वे न लोगों में आदर्शवादी उत्साह उत्पन्न कर सकते हैं और न आस्थाएँ विनिर्मित करने में सफल हो पाते हैं। यह कार्य धर्मक्षेत्र में कार्य करने वाले, उत्कृष्ट चरित्र एवं आशावान व्यक्ति ही अपने चरित्र एवं उदाहरण से जनसाधारण को भावनात्मक प्रगति के लिए प्रेरणा देकर कर सकते हैं। उन्हीं के उपदेशों का प्रभाव पड़ सकता है।

आज की राष्ट्रीय विपन्न परिस्थितियों में हमें यही करना होगा। भावनात्मक उत्कृष्टता की अभिवृद्धि के लिए धर्मतंत्र का सहारा लेना होगा, ताकि जनमानस के गहन अंतराल का कोमल स्पर्श करके उसके प्रसुप्त देवत्व को जाग्रत् किया जा सके। इसी प्रकार से हमारी अगणित कठिनाइयों की अँधियारी दूर हो सकेगी। मनुष्य भीतर से महान बनेगा तो बाहर से भी उसकी समृद्धि एवं शक्ति असीम होकर रहेगी।

वास्तविक स्वरूप उभरे
धर्मतंत्र को सशक्त बनाना संसार की सबसे बड़ी सेवा है, विश्व की सबसे बड़ी पूजा है। आज पूजा- पाठ, तिलक, छापा, जटा, कमंडल, स्नान, मंदिर दर्शन या थोड़ा- सा दानपुण्य कर लेना मात्र धर्म का स्वरूप मान लिया गया है। इतना कुछ कर लेने वाले अपने को धर्मात्मा समझने लगते हैं। हमें समझना और समझाना होगा कि यह धर्म का एक नगण्य अंश है। समग्र धर्म की धारणा आत्मसंयम, उज्जवल चरित्र, उदारता, ज्वलंत देशभक्ति एवं लोकसेवा की तत्परता में ही संभव है।

धर्मात्मा के लिए दयालु- क्षमाशील बनना ही पर्याप्त नहीं, वरन् उसके लिए सद्गुणी, शिष्ट, ईमानदार, कर्त्तव्यपरायण, साहसी, विवेकशील होना, अनीति के विरुद्ध लोहा लेने का शौर्य एवं कठोर श्रम करने के उत्साह से सम्पन्न होना भी अनिवार्य अंग है। जब तक इन गुणों का विकास न हो जाय, तब तक कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में कदापि धर्मात्मा कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता।

हमें जनसाधारण को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाना पड़ेगा और बताना पड़ेगा कि सुख- शांति का एकमात्र अवलंबन धर्म ही है। जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा होती है और जो धर्म को मारता है, धर्म उसे भी मार ही डालता है। अधर्म के मार्ग पर न कोई अब तक फला- फूला है और न सुख- शांति से रहा है। यह आस्था जब तक जनमानस में गहराई तक प्रवेश न करेगी, तब तक मानव जाति की समस्याओं एवं कठिनाइयों का हल न हो सकेगा। हमें अच्छा मनुष्य बनना चाहिए। नेक मनुष्य बनना चाहिए और सशक्त मनुष्य बनना चाहिए। शक्ति, नेकी और व्यवस्था यह तीनों ही धर्म के गुण हैं। व्यक्तित्व का समग्र विकास ही धर्म का उद्देश्य है।

मानव जाति को असीम पीड़ाओं से उन्मुक्त करने का श्रेय इसी मोर्चे पर लड़ने वालों को मिलेगा। इसलिए युग पुकारता है कि प्रत्येक पवित्र आत्मा आगे बढ़े, धर्म के वर्तमान स्वरूप को परिष्कृत करे, उस पर अनुपयोगिता की मलीनता को हटाकर स्वच्छता का वातावरण उत्पन्न करे। इसी शस्त्र से प्रस्तुत विभीषिकाओं का अंत किया जाना संभव है, इसीलिए उसे चमचमाती धार वाला तीक्ष्ण भी रखना ही पड़ेगा। जंग लगे व मोथरे हथियार अपना वास्तविक प्रयोजन हल कहाँ कर पाते हैं? धर्मतंत्र का आज जो स्वरूप है, उससे किसी को कोई आशा नहीं हो सकती है, इसे तो बदलना, पलटना एवं सुधारना अनिवार्य ही होगा।


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