Published on 2019-10-02 HARDWAR
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साधना अनुष्ठान की लकीर भर न पीटें, शक्ति साधना के उच्चतर सोपान चढ़ें

परंपरागत क्रम
शारदीय नवरात्र पर्व इस वर्ष कैलेंडर के अनुसार दिनांक २९ सितम्बर से ७ अक्टूबर तक चलेगा। युग निर्माण परिवार से जुड़े अधिकांश परिजन इन दिनों गायत्री जप-तप सहित विशेष साधना-अनुष्ठान करते हैं। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी व्यक्तिगत एवं सामूहिक साधना अनुष्ठानों का क्रम चलाया जाना है। नए साधकों को भी प्रेरणा-प्रोत्साहन देकर यथाशक्ति कुछ न कुछ मंत्र जप, मंत्र लेखन, चालीसा पाठ के साथ इंद्रिय संयम के व्रत निभाने के लिए तैयार किया जाए। जहाँ-जहाँ संभव हो, शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञा मंडलों के स्तर पर जप-सत्संग के सामूहिक क्रम भी चलाए जाएँ।

पुराने साधक नए साधकों को सुगम साधना अनुष्ठानों के लिए प्रेरित-प्रशिक्षित करने तथा उनका उत्साह बढ़ाते हुए उपयुक्त मार्गदर्शन देते रहने के क्रम को भी अपनी साधना का एक अंग मानें। साथ ही अनुष्ठानों का परंपरागत कर्मकांड भर पूरा करने की मानसिकता से ऊपर उठकर, शक्ति साधना के अपने स्तर को बढ़ाने, श्रेष्ठतर बनाने के लिए कमर कसें। आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण के अगले चरण सफलतापूर्वक बढ़ाते रहने के लिए ऐसा करना जरूरी है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव भी जीवन भर इसी तथ्य की ओर परिजनों का ध्यान आकर्षित करते तथा उसके लिए समर्थ मार्गदर्शन-सहयोग करते रहे हैं।

युगऋषि ने अपने प्रवचन 'साधना में प्राण आ जाए तो कमाल हो जाए' में स्पष्ट किया है कि साधना के क्रम में क्रिया (कर्मकांड), चिंतन (विचारणा) और श्रद्धा (भावना) जब एक ही दिशाधारा में सक्रिय हो उठते हैं, तो कमाल हो जाता है, सीमित कर्मकांड वाली साधना भी चमत्कारी परिणाम लाने लगती है। वे कर्मकांड को साधना की दृश्य-सूक्ष्म काया भर कहते थे। उसका एवं उसके लिए अपनाए गए प्रतीकों का अपना महत्व होता है। लेकिन स्थूल काया के साथ उसके सूक्ष्म शरीर (श्रेष्ठ विचारणा) और कारण शरीर (उत्कृष्ट भावना) का होना जरूरी है। वे इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए एकलव्य, मीरा, ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के उदाहरण देते रहे हैं। उनके द्वारा अपनाए गए प्रतीक सामान्य थे, पूजा-कर्मकांड भी कुछ विशेष नहीं था, किन्तु उनके पीछे सक्रिय श्रेष्ठ विचारणा-उत्कृष्ट भावना ने उन्हें चमत्कारी बना दिया। नवरात्र साधना के साथ जुड़े प्रेरक प्रतीक को एवं कर्मकांडों को भी इसी विधा द्वारा चमत्कारी बनाया जा सकता है।

शक्ति साधना के सुपरिणाम
सामान्य रूप से प्रचलित दोनों नवरात्रों के साथ शक्ति साधना के सत्परिणाम वाले त्यौहार जुड़े हैं। चैत्र नवरात्र के समापन पर ही श्रीराम नवमी पड़ती है। ऋषियों की तप साधना-शक्ति साधना के माध्यम से ही रामावतार का सुसंयोग बन पड़ा था। शारदीय नवरात्र समापन के अगले ही दिन विजयादशमी पड़ती है। भगवान श्रीराम की शक्ति साधना के नाते ही अत्याचारी रावण का वध संभव हुआ था। उसी नाते रामराज्य की स्थापना संभव हुई, जिसका प्रतीक पर्व दिवाली उसी शृंखला में मनाया जाता है।

भगवती दुर्गा का प्राकट्य भी देवताओं की संयुक्त शक्ति से हुआ था। देवों द्वारा अपनी विशेषताओं के एकीकरण की साधना ही उनके प्राकट्य का कारण बनी। शिव और शक्ति के समन्वय से ही जीवन की पूर्णता हस्तगत होती है। महादेव शिव का अर्धनारीनटेश्वर स्वरूप इसी तथ्य का उद्घोषक है। शिव एवं सती के प्रसंग में यही तथ्य उभरकर आता है कि शक्ति यदि स्वयं को शिव से भिन्न मान लेती है तो अकल्याण का कारण बनती है। शिव शक्ति के बिना उद्विग्न या समाधिस्थ-निष्क्रिय हो जाते हैं। शिव का शिवत्व शक्ति के नाते ही स्थापित होता है और शक्ति की सार्थकता भी शिवत्व के वरण से, कल्याणकारी उद्देश्य के लिए समर्पित रहने से ही सधती है।

नवरात्र साधना में नवदुर्गाओं के जो नाम और स्वरूप प्रचलित हैं वह व्यक्ति और समाज के लिए कल्याणकारी शक्ति साधना के प्रतिमान माने जा सकते हैं। नवरात्र साधना करने वाले प्रौढ़ साधकगण उनके मर्म को समझकर तदनुसार अपने लिए साधना के सोपान निश्चित कर सकें तो आत्मकल्याण और जनहित के श्रेष्ठत्तर लक्ष्यों को पाने का क्रम चलता रह सकता है। इस आलेख की आगे की पंक्तियों में उन्हीं को स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।

नौ शक्ति धाराएँ
नवदुर्गा के रूप में माँ दुर्गा के नौ रूपों का वर्णन है, जिन्हें शक्ति साधना के क्रम में नौ शक्ति धाराओं अथवा पूर्णता के नौ सोपानों के रूप में समझा और साधा जा सकता है। वे हैं क्रमश: -
१. शैलपुत्री, २. ब्रह्मचारिणी, ३. चंद्रघंटा, ४. कूष्मांडा, ५. स्कंदमाता, ६. कात्यायनी ७. कालरात्रि, ८. महागौरी, ९. सिद्धिदात्री।
इन धाराओं को जीवन साधना का अंग बनाने के लिए दुर्गा सप्तशती के ही संकेतों के आधार पर यहाँ चिंतन मंथन किया जाता है। मां दुर्गा की स्तुति में लिखा है-
"विद्या समस्तास्तवदेवी भेद: स्त्रिया: समस्ता सकला जगत्सु।"

अर्थात हे देवी! विश्व की सारी विद्याएँ तथा समस्त स्त्रियाँ आपका ही रूप हैं। नारी को शक्तिस्वरूपा कहा गया है, अस्तु नारी की जीवन यात्रा स्वाभाविक रूप से उक्त प्रतीकात्मक शक्ति धाराओं के अनुरूप होनी चाहिए। इसी आधार पर वे परिवार और समाज में शिवत्व को, कल्याणकारी व्यवस्थाओं को लागू कर सकती हैं।

विद्याएँ विकसित होती है बुद्धि के विवेकपूर्ण चयन-वरण और तदनुसार अभ्यास- तप साधना से। अस्तु बुद्धि को शिवोन्मुख, कल्याणकारी संकल्प से युक्त होना चाहिए। भगवान आदि शंकराचार्य ने शिव की वंदना में कहा है च्आत्मा त्वं गिरिजामति:ज् अर्थात् मनुष्य के अंदर शिव रूप में आत्मा और उसकी अर्धांगिनी शक्ति स्वरूपा पार्वती (गिरिजा) के रूप में बुद्धि (मति) विराजमान है। अर्थात् बुद्धि को शिव (अर्थात् कल्याणकारी) आत्मानुशासन के अनुरूप ही विकसित एवं सक्रिय होना चाहिए। नौ दुर्गा की प्रतीक शक्तियों के अनुसार नारी और सत्प्रवृतियों का विकास किया जाना चाहिए। इन्हीं दो प्रतिमानों के अनुसार नौ शक्ति धाराओं की समीक्षात्मक विवेचना क्रमश: की जा रही है।

१ शैलपुत्री :- यह पहला स्वरूप है। इसका रहस्य समझने के लिए शिव-सती प्रसंग पर ध्यान देना होगा। च्सतीज् दक्ष की पुत्री है। दक्ष अर्थात् अपने कार्य में निपुण व्यक्ति। बहुधा निपुणों को अपनी विशेषज्ञता का अहंकार हो जाता है। उस स्थिति में वे जनकल्याण के शिव तत्व की उपेक्षा करके भी अपने आप को प्रतिष्ठित करना चाहते है। प्रजापति बनने पर दक्ष ने यही किया। शिव की अवमानना करने लगे।

सती शिव की अर्धांगिनी है, किंतु वे स्वयं को दक्ष की- निपुण एवं अधिकार प्राप्त व्यक्ति की बेटी मानती हैं। इसी आंतरिक मान्यता के कारण वे शिव की अर्धांगिनी-पूरक होने का तथ्य भूलने लगती हैं। शिव के बार-बार सावधान करने पर भी मानती नहीं। यही मान्यता उनके दु:ख और पतन का कारण बन जाती है। शिव से विमुख होने के प्रायश्चित्त स्वरूप वे शरीर छोड़ देती हैं। अपनी भूल समझती हैं और फिर हिमाचल की पुत्री के रूप में आती हैं। हिम शांति और पर्वत स्थिरता का प्रतीक होता है। बुद्धि यदि चतुर व्यक्ति की है तो वह कुचक्रों में फँस जाती है। यदि शांत एवं दृढ़ आस्थावान की है, तो वह शिव-आत्मा के कल्याणकारी अनुशासन को ही इष्ट-लक्ष्य मानती है।

हर नारी को पहले बाल्यकाल में शैलपुत्री अर्थात् शिवत्व के प्रति समर्पित भाव से विकसित होना चाहिए। बुद्धि को भी अपनी कुशलता दिखाने की अपेक्षा केवल कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। इस मूल आस्था को दृढ़ किया जाए तो नर-नारी सभी की शक्ति शिवोन्मुख कल्याणकारी हो जाएगी। शैलपुत्री की साधना से ऐसी ही दृढ़ आस्था विकसित होनी चाहिए।

२. ब्रह्मचारिणी :- पार्वती को शिव का वरण करना था तो ब्रह्मचर्य व्रत पूर्वक तप साधना करनी आवश्यक थी। इससे कम में शिव की प्राप्ति संभव नहीं। अस्तु नारी को अपनी प्रवृत्तियों को कल्याणकारी बनाने के लिए तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम का अभ्यास करना चाहिए। बुद्धि को 'ब्रह्मचर्य' ब्रह्म के अनुरूप आचरण, ब्रह्म को ही धारण करने के लिए संस्कारित होना चाहिए। इसी से बुद्धि में वह सात्विक-शक्ति जाग्रत् होती है, जिसका वरण शिव प्रसन्नता से करते हैं।

३. चंद्रघंटा :- शिव का वरण करते ही शक्ति में शिवत्व झलकने लगता है। माता चंद्रघंटा के माथे पर शिवजी के प्रगतिशील विचारों का प्रतीक घंटे की आकृति वाला बालचंद्र होता है। इनके घंटे की ध्वनि भक्तों को शांति प्रदान करने वाली और दुष्टों को भयभीत करने वाली होती है। विवाहित होते ही हर नारी को इसी भूमिका में आना चाहिए। हर साधक के अंतकरण से ऐसे ही स्वर उभरने चाहिए। इनके साधक के अंदर वीरता और आत्मनिर्भरता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता-शालीनता का विकास होना ही चाहिए।

४. कूष्मांडा :- यह माँ का चौथा रूप है। यह शिव के संकल्प के अनुसार नई सृष्टि करने में समर्थ होती हैं। विवाह के बाद हर नारी को शिवत्वयुक्त नई पीढ़ी गढ़ने की भूमिका निभानी चाहिए। माँ कूष्मांडा की साधना से यह सत्सामर्थ्य प्रकट होती है। पुरुष की प्रगति एवं प्रवृत्तियों को भी शुभ सृजनशील बनाने में इस शक्ति धारा का समर्थ योगदान होता है।

५. स्कंदमाता :- यह भगवती का पाँचवा स्वरुप है। ये स्कंद-स्वामी कार्तिकेय की माता है। स्वामी कार्तिकेय दानवी प्रवृतियों का दलन करने वाले, देव शक्तियों के सेनापति हैं। माँ ने उन्हें इस योग्य विकसित किया, इसीलिए वह स्कंदमाता कहलार्इं। हर नारी में अपनी संतान को समय के अनुरूप आसुरी शक्तियों को परास्त करने तथा देव शक्तियों को सुदृढ़ बनाने योग्य संस्कार देने वाली होना चाहिए। मनुष्य में इस प्रकार का सत्साहस और शौर्य प्रकट करने में मां की शक्ति धारा का सुनिश्चित आशीर्वाद पाया जा सकता है।

६. कात्यायनी :- इस रूप में मां भगवती ने महिषासुर का वध किया था। महिषासुर मनुष्य होते हुए भी अपनी पशु प्रवृतियों से आतंक मचाता था। ऐसे नर पशुओं का संहार करने वाली मां की आराधना सभी के लिए आवश्यक है। हर नारी, हर माता को नर-पशुओं का दलन करने की क्षमता से युक्त होना चाहिए। हर व्यक्ति के अंदर यह शक्ति जागे तो समाज को सहज ही नर-पशुओं, नर-पिशाचों के उत्पात से मुक्त करके कल्याणकारी दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।

७. माँ कालरात्रि :- यह माँ का महाकाली रूप है। माँ शुभ वर्णा, गौरी हैं। किंतु रक्तबीज जैसे असुरों का उत्पादन रोकने तथा विनाश करने के लिए काली-भयंकर रूप वाली बन जाती हैं। मनुष्य का लौकिक अहंकार रक्तबीज की तरह होता है। मारे जाने पर भी उसके छोटे से अंश से पुन: वही रूप बन जाता है। माता उसे नष्ट करने के लिए रुद्ररूप बना लेती है, किंतु उसके पीछे भी उनका भाव समाज का हित साधन ही होता है। इसीलिए उन्हें शुभंकरी (शुभ करने वाली) भी कहा जाता है। प्रत्येक साधक नर-नारी को माँ की कृपा से अपने अंदर शुभंकरी उग्र शक्ति का विकास करने की साधना करनी चाहिए।

८. महागौरी :- अशिव तत्त्वों, अशिव प्रवृत्तियों को नष्ट करने के बाद शक्ति पुन: अपने सौम्य 'गौरी' शिवप्रिया के रूप में आ जाती है। वे गौर वर्ण है। अनेक वस्त्र-आभूषण भी शुभ्र होते हैं। उग्र सिंह का वाहन छोड़ कर वे शिव के प्रिय वाहन वृषभ पर विराजती हैं। अर्थात् सौम्य, शिवप्रिय, शक्तिशाली साधक को अपना माध्यम बनाती हैं और सज्जनों-सत्पुरुषोंयुक्त समाज के लिए अभय मुद्रा एवं वर मुद्रा धारण किए हैं। प्रौढ़ नारी इसी स्वरूप में प्रतिष्ठित होनी चाहिए। हर साधक में सज्जनों को भय रहित करने एवं श्रेष्ठ अनुदान देने की क्षमता इनकी साधना से विकसित हो सकती है।

९. सिद्धिदात्री :- माँ भगवती का यह स्वरूप शिवजी को भी सिद्धि प्रदान करने वाला कहा जाता है। साधना के इस चरण तक पहुँचते-पहुँचते शिव शक्तिमय और शक्ति शिवमय स्वरूप ले लेती हैं। हर साधक मेें अर्धनारीनटेश्वर का स्वरूप उभरने लगता है। ९ अंक को पूर्णांक कहते हैं। मां के नवम में स्वरूप में पूर्णता-पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति में अभिन्नता का बोध होने लगता है। इसीलिए उन्हें मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। जीवात्मा को अपने शुद्ध-शिव स्वरूप का बोध होने लगता है, जो भी शक्ति है वह शिवमय, कल्याणकारी हो जाती है, तो फिर उसकी स्वाभाविक गति मोक्षप्रद ही हो जाती है।
 
नवरात्र साधना के क्रम में प्रौढ़ साधकों को नवदुर्गाओं के इन नौ रूपों का बोध करते हुए, जीवन को शिव-शक्तियुक्त बनाने के साधनात्मक प्रयास करने चाहिए।
परंपरागत ढंग से नवरात्रों के दौरान जगह-जगह दुर्गा माता की प्रतिमाएँ स्थापित करके उल्लासभरे उत्सव का माहौल बनाया जाता है। उन सभी के प्रबंधक सदस्यों से सम्पर्क करके उस समारोह के साथ जोड़ने के प्राणवान प्रयास परिजनों द्वारा किये जा सकते हैं। जैसे शाम की आरती के कुछ समय पहले से सामूहिक जप-सामूहिक प्रार्थना का क्रम चलाना। छोटे-छोटे प्रवचन-कथानकों के माध्यम से श्रद्धालुओं को दिशा देने के प्रयास करना आदि।


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