Published on 2019-10-05 HARDWAR
img


जाग्रत् आत्माओं के संगठन, प्रशिक्षण, नियोजन का समर्थ तंत्र बनाए

पुनरावृत्ति

विजयादशमी पर्व से संबंधित दो कथाएँ प्रसिद्ध हैं। एक है माता दुर्गा के द्वारा महिषासुर और उसके असुर अनुयायियों का विनाश और दूसरी है भगवान श्री राम द्वारा रावण पोषित आसुरी तंत्र का उच्छेदन। आतंकी आसुरी तंत्र को निरस्त करने के लिए दोनों में ही बिखरी हुई देवशक्तियों को संगठित किया गया। प्रत्यक्ष और परोक्ष दिव्य पुरुषार्थ के समन्वय से असंभव से दिखने वाले कार्य संभव हो सके। अनीति- अनाचार के आतंक को निरस्त करके स्नेह- सौजन्य युक्त स्वर्णिम व्यवस्था पुन: स्थापित करने की ईश्वरीय योजना साकार हुई।

वर्तमान समय में युग परिवर्तन की ईश्वरीय योजना को प्रभावी बनाने के लिए भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया की समयानुसार पुनरावृत्ति की जानी है। भयानक दुष्प्रवृत्तियों के कारण प्रकृति और मानवता के अस्तित्व पर ही प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिए गए हैं। देवी योजना के अनुसार बिखरी हुई जागृत आत्माओं को एकत्रित- संगठित करके उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के मोर्चे पर लगाया जाना है। इस अभियान को इतना सशक्त, व्यापक, समर्थ बनाना है कि सामाजिक व्यवस्था पर हावी हो रही दुष्प्रवृत्तियों को निरस्त किया जा सके और प्रज्ञायुग के अनुरूप सतयुगी वातावरण बनाया जा सके।

ऐसे कार्य परमात्मसत्ता के परोक्ष और प्रत्यक्ष तंत्र के समन्वित पुरुषार्थ से ही सिद्ध होते हैं। किसी फैक्ट्री के सभी यंत्र पावर हाउस से प्रवाहित बिजली से ही चलते हैं। लेकिन यंत्र यदि प्रामाणिक स्तर के न हों तो पर्याप्त बिजली होने पर भी काम चलता नहीं। इसी प्रकार अवतारी सत्ता का समर्थ चेतन प्रवाह भी उपयुक्त प्रामाणिक व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों के माध्यम से ही कार्य करता है। इसीलिए हनुमान उपयुक्त माध्यम बनते हैं तो राम अपनी प्रसन्नता एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं तो राम दु:खी हो जाते हैं, हर कीमत चुकाकर उन्हें चैतन्य अवस्था में लाने को आतुर हो जाते हैं। अर्जुन अपने पुरुषार्थ से कतराने लगता है तो कृष्ण नाराजगी व्यक्त करते हैं, उसे पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। दोनों के समन्वित पुरुषार्थ से ही काम बनते हैं। इसीलिए गीताकार ने अंतिम श्लोक में यही भाव व्यक्त किए हैं कि ‘‘जहाँ योगेश्वर कृष्ण और पुरुषार्थी पार्थ का संयोग बनता है, वहीं श्री, विजय, विभूति आदि की सिद्धि होती है।’’

प्रज्ञापुराण (प्रथम खंड) में भगवान विष्णु नारद को यही निर्देश देते हैं- ‘‘मैं परोक्ष स्तर पर प्रेरणा एवं शक्ति का संचार करूँगा और तुम उस संचार को क्रियाशील रूप देने वाले प्रामाणिक माध्यमों को तैयार करो। इसके लिए जागृत आत्माओं को बड़ी संख्या में भेजा गया है। उन्हें उनके जीवनोद्देश्य का स्मरण कराओ। उनमें उत्साह उभरे तो उसे तत्काल किसी उपयुक्त, भले ही सुगम कार्य में लगा दो। इतनी व्यवस्था बन गई तो आगे के कार्य हमारी युगांतरीय चेतना संपन्न करा लेगी।’’

चूँकि कार्य विश्वव्यापी परिवर्तन का है, इसलिए सभी वर्गों और क्षेत्रों की प्रतिभाओं को इसमें लगाना ही पड़ेगा, तभी युगक्रांति की ऐसी आँधी चलेगी जो तमाम विसंगतियों को तहस- नहस कर दे। इसके लिए हर क्षेत्र में जागृत आत्माएँ भेजी गई हैं। उन सब तक प्रेरणा पहुँचाने तथा उत्साहित करके युग परिवर्तन के किसी न किसी कार्य में नियोजित करने का कार्य युग निर्माण के सृजन सैनिकों को करना है।

लक्ष्य के अनुरूप तैयारी


जिस स्तर का कार्य सामने हो, उसी स्तर की तैयारी उसे संपन्न करने के लिए की जाती है। बड़ी योजनाएँ लंबे समय तक चलती हैं। उनके मुख्य लक्ष्य को स्मरण में रखते हुए चरणबद्ध- समयबद्ध सामयिक लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। हर चरण की सफलता अभियान की सामर्थ्य को बढ़ाती है। बढ़ी हुई सामर्थ्य को अगले चरण के अपेक्षाकृत बड़े लक्ष्यों की पूर्ति में लगाया जाता है।

युग निर्माण का तंत्र इस दिशा में जागरूक है। उक्त प्रक्रिया के अंतर्गत वंदनीया माताजी के जन्मशती वर्ष (2026) तक देश के हर प्रांत के हर जिले, हर ब्लॉक और हर गाँव तक अभियान की दिव्य प्रेरणाएँ पहुँचाने और वहाँ युग निर्माण की जीवंत इकाइयाँ स्थापित करने का लक्ष्य घोषित किया जा चुका है। घोषणा के समय जन्मशती तक 9 वर्ष का समय उपलब्ध था। कहा गया था कि इसे तीन- तीन वर्ष के तीन चरणों में पूरा किया जाए। पहली त्रिवार्षिक अवधि 2019 में पूरी हो जाएगी। गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ अभियान इसी योजना के अंतर्गत चलाया गया, जिसमें सफलता के नए कीर्तिमान बनो और परिजनों में नया मनोबल और उत्साह जागा। इसके लिए सभी अग्रदूत एवं सहयोगी परिजन साधुवाद के पात्र हैं।

जो कार्य हुआ वह सराहनीय है, किंतु जो अभी शेष है, उसकी बड़ी चुनौतियाँ सामने आ गई हैं। बड़े भोजन भंडारे की घोषणा करके उसमें शामिल होने का उत्साह जन- जन में जगाना कठिन नहीं है। लेकिन आमंत्रितों को भोजन कराने, उन्हें संतुष्ट करने के लिए बहुत बड़ी व्यवस्था बनानी पड़ती है। इसी प्रकार नवसृजन अभियान में ईश्वर के साथ भागीदारी के लिए लोगों के मनों में उत्साह जगा देना कठिन नहीं है। लेकिन साझेदारी के लिए उनमें अविचल धैर्य, अदम्य साहस और कुशलता जगाना आसान नहीं है। इसके लिए बड़ी सूझबूझ और कुशलता के साथ निरंतर प्रयास करने पड़ेंगे। जैसे-
• सामूहिक उल्लास के प्रवाह में कौतुकी प्रकृति के व्यक्ति भी बड़ी संख्या में जुड़ जाते हैं। वे अधिक समय टिकते नहीं। उनके बीच से प्राणवानों, जागृत आत्माओं को छांट लेना, उन्हें निरंतर संपर्क में रखकर प्रेरणा और प्रोत्साहन देते हुए सृजन साधना में लगाए रखना बहुत जरूरी होता है। आवश्यकता के अनुसार उनमें कुशलता बढ़ाने के लिए प्रयोगों और प्रशिक्षणों की भी व्यवस्था बनानी पड़ती है। तभी अगले चरण के बड़े लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त संख्या में पर्याप्त कुशल सृजन सैनिकों की उपलब्धि हो पाती है। सन् 2026 तक के लिए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हमें उपलब्ध सृजन सैनिकों के सुयोजन से नए क्षेत्रों में विस्तार और नए क्षेत्रों से उभरने वाले उत्साहियों को प्रेरणा- प्रशिक्षण देकर अगले चरणों की सिद्धि हेतु नियोजित करते रहने की शृंखला निरंतर गतिमान रखनी होगी। केन्द्र ने इसके लिए चरणबद्ध कार्य योजना बनाई है, जिसे क्षेत्रीय छोटी- बड़ी सभी इकाइयों द्वारा विवेक और उत्साहपूर्वक चलाया जाना है।

क्रमिक चरण

विस्तार: • संपर्क में आए पुराने और नए क्षेत्रों को चिह्नित करें। उनमें संगठन की मूलभूत इकाइयों, प्रज्ञा मंडलों (पुरुष मंडल, महिला मंडल, युवा मंडल या संयुक्त मंडलों) की प्रामाणिक समीक्षा करें। यदि वे निष्क्रिय हैं तो उन्हें सक्रिय किया जाए। उनके सदस्यों की संख्या 1 से 5, 5 से 25, 25 से 125 के क्रम से बढ़ाने की व्यवस्था बनाई जाए। चालीस- पचास से अधिक संख्या हो जाने पर उन्हें क्षेत्रों के हिसाब से दो स्वतंत्र मंडलों में बाँट दिया जाए। इस प्रकार विकसित होने वाले नए मंडलों में नए उत्साही और पुराने अनुभवी दोनों प्रकार के सदस्य शामिल रहेंगे। इससे उनको जीवंत बनाये रखने में सुविधा रहेगी।

नये क्षेत्रों में बने मण्डलों को प्रेरित- प्रोत्साहित करते रहने की जिम्मेदारी निकटस्थ अनुभवी परिजनों को सौंपी जाय। उन्हें प्रेम और प्रेरणा देते रहकर उनका उत्साह बढ़ाते रहने से नये मण्डलों का समुचित विकास होता रहेगा।

संगठन :: • युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि यह मण्डल ही व्यक्ति निर्माण एवं संगठन की मूलभूत इकाइयों के रूप में विकसित होते रहने चाहिए। हर सदस्य ईश- उपासना, जीवन साधना और लोक आराधना की साधनाएँ नित्य करें। सप्ताह में एक बार सामूहिक साधना, स्वाध्याय करें, संयम एवं सेवा के सामूहिक प्रयोग करें। इससे परस्पर आत्मीयता और कुशलता बढ़ाते रहने का लाभ सहज ही मिलता है।

• हर सदस्य को प्रतिदिन कम से कम एक घंटा समय लोकमंगल के कार्यों में लगाने के लिए प्रेरणा एवं सहयोग देने का क्रम भी बनाया जाय। परिस्थितियों के अनुसार सप्ताह में कम से कम सात घंटे और माह में तीस घंटे के समयदान की व्यवस्था भी बनाई जा सकती है।
• हर समयदानी सदस्य से सृजन कार्यों के निमित्त उनकी रुचि और क्षमता भी पूछी जाय। किसी को साहित्य विस्तार, किसी को यज्ञ- संस्कार, किसी को प्रचार- प्रवचन, किसी को किन्हीं रचनात्मक कार्यों, सुधारात्मक आन्दोलनों में सहज रुचि होती है। प्रारम्भ में अपनी सहज रुचि के कार्यों में व्यक्ति प्रसन्नता से लग जाता है। बाद में आवश्यकता के अनुसार अन्य कार्यों में भी मन लगने लगता है। पहले क्षमता के अनुसार कार्य दिये जावें तो बाद में कार्य के अनुरूप क्षमता के विकास में भी रस आने लगता है।

प्रशिक्षण :: • कार्य के अनुरूप क्षमता के विकास के लिए प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है। इसलिए पुराने अनुभवी व्यक्तियों को प्रशिक्षण देते रहने की जिम्मेदारी भी निभाने को तैयार रहना चाहिए। समयदानी साधकों की रुचि का लेखा- जोखा होने से उन्हें प्रारम्भ में उन्हीं कार्यों (कर्मकाण्ड, संगीत, साधना, प्रवचन, रचनात्मक कार्यों) में प्रशिक्षण देना सम्भव हो पाता है। किसी एक विषय में सक्रिय हो जाने से मनोबल बढ़ता है। इस अनुभव के बाद अन्य विषयों में भी उत्साह बढ़ता है।
• प्रशिक्षण भी कई स्तर के हो सकते हैं। थोड़ा- थोड़ा समय देने वाले के लिए प्रतिदिन या सप्ताह में 3 दिन, एक- दो घंटे के प्रशिक्षण सहजता से चलाये जा सकते हैं। किसी छुट्टी के दिन 8 घंटे के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी स्थानीय स्तर पर बनाई जा सकती है। हर प्रशिक्षण में विषयों में कुशलता बढ़ाने के साथ ही उन्हें संगठन की रीतिनीति के आवश्यक सूत्र भी सिखाते रहना चाहिए। इससे उनके लिए अनुशासित ढंग से आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है।
• अधिक समय एक साथ दे सकने वाले समयदानियों से भी उनकी रुचि और क्षमता जान लेनी चाहिए। इससे उन्हें तत्काल काम सौंपना अथवा उनकी योग्यता विकास के क्रम को आगे बढ़ाते रहना सहज हो जाता है। उनके प्रशिक्षण भी विषयवार चलाते रहने से वे जल्दी तैयार होते हैं। सुविधा के अनुसार उनके लिए कई दिनों के आवासीय प्रशिक्षण भी चलाये जा सकते हैं। इसके लिए ब्लॉक, जिला या उपजोन स्तर के संगठनों से वाञ्छित सहयोग भी प्राप्त किए जा सकते हैं। ध्यान रहे कि प्रभावित व्यक्तियों को संगठित और प्रशिक्षित करने से ही सृजन सैनिकों की संख्या और गुणवत्ता को निरंतर बढ़ाते रहना संभव होगा। इसी विकास प्रक्रिया के आधार पर निर्धारित लक्ष्यों को निर्धारित अवधि में प्राप्त करते रहा जा सकता है।
नियोजन :: प्रशिक्षण पाये हुए व्यक्तियों को तत्काल कोई ऐसी जिम्मेदारी सौंपी जाये, जिसमें उन्हें प्रशिक्षण से प्राप्त अपनी योग्यता को इस्तेमाल करना पड़े। यदि तत्काल अभ्यास न मिले तो प्राप्त प्रशिक्षण क्रमश: भूलने लगता है। प्रशिक्षण देने या पाने की उपयोगिता घट जाती है। इसके लिए समर्थ समयदानियों का तंत्र भी विकसित करना चाहिए।
समर्थ समयदानी दो तरह के हो सकते हैं। एक वे जो किसी कार्य में नियमित समयदान करते आ रहे हैं तथा अपने अनुभव के आधार पर कुछ (दो- चार से आठ- दस तक) समयदानियों को नियोजित कर सकते हैं। देखा गया है कि भावनापूर्वक समयदान का संकल्प देने वाले अधिकांश साधक समयदान करना चाहते हैं। लेकिन कब क्या करें, यह निर्धारण नहीं कर पाते। कुछ विचार उभरे भी तो संकोच के कारण शुरू ही नहीं कर पाते। यदि उन्हें छोटे- छोटे कार्य सौंपे जायें, कुशल व्यक्तियों के साथ सहयोगी बनने का मौका मिले तो वे सक्रिय हो जाते हैं। अपने संकल्प की पूर्ति का संतोष और कार्य से प्राप्त अनुभव उन्हें निरंतर प्रगति की प्रेरणा देते हैं।

दूसरे समर्थ समयदानी वे कहे जा सकते हैं जो स्वयं तो अधिक समय नहीं दे पाते लेकिन अपने प्रभाव और कौशल से समयदानियों के मार्ग में आने वाली समस्याओं के समाधान निकालते रह सकते हैं। उनके संरक्षण और मार्गदर्शन से समयदानियों का हौसला निरन्तर बढ़ता रहता है। इस प्रकार समयदानियों के संगठन, प्रशिक्षण और सुनियोजन की व्यवस्था बन जाये तो कुशल समयदानियों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाते रहने का अविरल क्रम चल पड़ना कठिन नहीं है। निर्धारित अवधि में निर्धारित लक्ष्य हासिल करने योग्य समर्थ्य सृजन सेना विकसित करते रहने में सफलता मिल सकती है। देव संस्कृति दिग्विजय के लिए ऋषिसत्ता द्वारा निर्धारित चरण शानदार ढंग से पूरे किए जा सकते हैं।


लक्ष्यबद्ध चिन्तन

प्रस्तुत कार्ययोजना के सूत्र सरसरी दृष्टि से देखने में भले ही सामान्य लगें, किन्तु युगऋषि द्वारा दिए गये लक्ष्यबद्ध चिन्तन से जुड़ते ही उनकी गहराई, अनूठी सृजन सामर्थ्य का बोध होने लगता है। इसे लौकिक यश देने वाला कार्य न मानकर प्रभु के उच्चस्तरीय अनुग्रहों का सत्पात्र बनाने वाली श्रेष्ठ साधना मानकर किया जाय। शक्ति प्रदर्शन वाले आयोजनों की अपेक्षा सृजनशक्ति संवर्धन की उक्त साधना को अधिक महत्त्व दिया जाय। स्पष्ट है कि सही दिशा में किए जाने वाले नैष्ठिक प्रयासों के साथ प्रभु अनुग्रह जुड़ते ही कठिन से कठिन लक्ष्य भी हस्तगत हो ही जाते हैं।


Write Your Comments Here:


img

ईश्वर की इच्छा, हमारी जिम्मेदारी हम यज्ञमय जीवन जिएँ

जीवन और यज्ञ गीताकार का कथन है- सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।। गीता 3/10 अर्थात्.....

img

तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रकाश ही जीवन है प्रकाश ही जीवन है और अन्धकार ही मरण। प्रकाश में वस्तुओं का स्पष्ट रूप दर्शाने.....

img

गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘.....


Warning: Unknown: write failed: No space left on device (28) in Unknown on line 0

Warning: Unknown: Failed to write session data (files). Please verify that the current setting of session.save_path is correct (/var/lib/php/sessions) in Unknown on line 0