Published on 2019-10-23
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प्रकाश ही जीवन है


प्रकाश ही जीवन है और अन्धकार ही मरण। प्रकाश में वस्तुओं का स्पष्ट रूप दर्शाने की क्षमता तो होती ही है। इसके अतिरिक्त उसमें ऊर्जा भी सन्निहित रहती है। यही कारण है कि सूर्य के उदय होते ही सर्वत्र गतिशीलता का प्रादुर्भाव होता है। पक्षी अपने घोंसले से निकल कर फुदकने लगते हैं, चहकने लगते हैं। पशु बाड़ा छोड़कर भोजन की तलाश में निकलते हैं। सोने वाले नींद छोड़कर नित्यकर्म से निपटते और नये दिन के कार्य आरम्भ करते हैं। सभी का उपार्जन, उत्पादन, निर्माण, उत्थान का क्रम अपने- अपने ढंग से चल पड़ता है।

संसार की हर जड़- चेतन इकाई जीवन के प्रति उत्सुक रहती और मरण के प्रति अनुत्सुक। इसलिए उसे प्रकाश का आश्रय लेना पड़ता है। प्र्रकाश के अभाव में कोई किसी की सहायता न कर सकेगा। यहाँ तक कि सद्ग्रन्थ भी अक्षर दीख न पड़ने के कारण अपना मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ न हो सकेंगे। प्रकाश की जितनी कमी पड़ती जायेगी, उतनी ही प्रगति अवरुद्ध होती जायेगी।

सद्ज्ञान प्राप्ति का सूत्र- मंत्र


भौतिक जगत में जो स्थान प्रकाश का है, ऊर्जा का है, वही सम्मिश्रित प्रभाव अध्यात्म जगत में सद्ज्ञान का है। इसलिए श्रुति परिकर में स्थान- स्थान पर सद्ज्ञान रूपी दिव्य प्रकाश की उपलब्धि के लिए परब्रह्म से भावभरी प्रार्थनाएँ की गई हैं। ऋषि के शब्दों में सार्वभौम अन्तरात्मा ने प्रार्थना की है कि ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, जिसका अर्थ है- हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

गायत्री महामंत्र में इसी सर्वोपरि विभूति, उपलब्धि को हस्तगत करने का तारतम्य है। इस दिव्य वरदान की प्राप्ति के लिए आत्मा ने अपनी प्रबल आकांक्षा की अभिव्यक्ति की है। इसे प्राप्त कर सकने का विधान, प्रयोग भी उसमें सन्निहित है। इसी कारण गायत्री को वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता आदि नामों से अलंकृत किया गया है। उसी दिव्य ज्ञान को भूमा, प्रज्ञा, प्राण, संवेदना आदि नामों से पुकारा गया। उसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। जिसके हाथ में यह चिन्तामणि पहुँचती है वह इसी जीवन में स्वर्ग, मोक्ष और सिद्धि का आनन्द प्राप्त करता है। अलंकारिक भाषा में उसे अमृत, कल्पवृक्ष और पारस नाम से निरूपित किया जाता है।

शिक्षा के साथ भी

शिक्षा और विद्या का अन्तर स्पष्ट है। शिक्षा की परिधि में भौतिक दुनियादारियों का समुच्चय आता है। उसके आधार पर चतुर, अनुभवी, क्रिया- कुशल बना जाता है और धनोपार्जन से लेकर यशस्वी, पदाधिकारी, सफल, सम्मानित बना जाता है। इन प्रत्यक्ष लाभों को देखते हुए सरकारी और गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं की धूम है। अगणित पुस्तकें इसी उद्देश्य के लिए लिखी जाती हैं। रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म, अखबार, पत्रिकाएँ आदि भी इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए अपना विशालकाय ढाँचा खड़ा किये हुए हैं। पर्यटन, प्रदर्शन, विज्ञापन- प्रचार आदि माध्यमों से भी इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है।

विद्या इससे आगे की उच्चस्तरीय उपलब्धि है। यह आत्मिकी का क्षेत्र है, अप्रत्यक्ष है। इसे इंद्रियातीत कहा गया है। अन्तर्मुखी होने पर ही इसका स्वरूप समझा और लाभ उठाया जा सकता है। विद्या का शुभारंभ आत्मिक क्षेत्र के चिंन्तन (वस्तुस्थिति का अध्ययन- अवगाहन) और मनन (विकृतियों के परिशोधन और सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन की विचारणा- योजना और संभावनाओं की अभिनव स्थापना) से होता है।

पेड़ का तना, उस पर बार- बार आने वाले पल्लव, फूल- फलों का समुच्चय प्रत्यक्ष दीखते हैं, पर उन सबको जीवन तथा विकास देने वाली जड़ें जमीन के अन्दर रहती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं, फिर भी विचारशील निश्चयपूर्वक जानते हैं कि जड़ें ही वृक्ष की प्रगति एवं स्थिरता का आधारभूत कारण हैं। यदि जड़ें सूख जायें, उन्हें दीमक चर जाय तो समझना चाहिए कि वृक्ष का जीवन समाप्त हुआ। वह सूखेगा और हवा के किसी बड़े झोंके में धराशायी हो जायेगा।

आत्मिकी का महत्त्व भी समझें


व्यक्ति को एक वृक्ष समझा जा सकता है। उसका बाह्य वैभव है भौतिकी और जड़ों वाला अदृश्य पक्ष आत्मिकी। साधारण बुद्धि आत्मिकी का अर्थ नहीं समझती, वह भौतिकी को ही सब कुछ मान बैठती है। इतने पर भी तथ्य यथास्थान रहते हैं। सद्गुणों के बिना मनुष्य अनगढ़ ही बना रहता है। उसके गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसी प्रखरता उत्पन्न नहीं होती कि वह साधारण कार्यों को भी सांगोपांग ढंग से सम्पन्न कर सके। कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर सकना तो उसके लिए किसी भी प्र्रकार शक्य नहीं हो पाता। जिनकी जड़ों को पोषण नहीं मिला, वे किसी प्रकार जिन्दगी के दिन तो पूरे करते हैं, पर फूलते- फलते वृक्ष जैसा प्रभाव, गौरव कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। पुण्य- परमार्थ की बात तो उनके चिन्तन तक में प्रवेश नहीं कर पाती और उस प्रयोजन को कार्यरूप में परिणत कर सकना तो बन ही कैसे पड़े?

ज्ञान की गरिमा ‘आत्मज्ञान’ के रखने में जानी जाती है। जिसे जीवन के स्वरूप, उद्देश्य और सदुपयोग का बोध सांगोपांग नहीं हुआ, वह न तो आदर्शों के साथ जुड़ पाता है और न शालीनता, उत्कृष्टता की राह समझने तथा उस पर चलने की विधि- व्यवस्था से परिचित होता है। ऐसी दशा में व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का, शालीनता का समावेश तो हो ही नहीं सकता। इस अभाव के कारण स्थिति अस्त- व्यस्त, अनगढ़, असंस्कृत जैसी ही बनी रहती है। जिस आधार पर उच्चस्तरीय प्रगति बन पड़ती है- स्नेह, सहयोग, सद्भाव मिल सकता है, वह सूत्र हाथ ही नहीं आता। ऐसी दशा में पिछड़ेपन की हेय स्थिति ही घेरे रहती है। उस दलदल में से उबरकर मानवीय गरिमा के अनुरूप कोई श्रेय- सुयोग हाथ ही नहीं लग पाता। आत्मिकी से अनजान रहने पर यही दु:खद परिणाम निरन्तर सामने खड़ा रहता है।

भौतिकी के क्षेत्र में प्रकाश का अर्थ है- रोशनी, ऊर्जा। यही है वह मौलिक शक्ति, जिसके आधार पर संसार का समस्त जड़- चेतन गतिशील हो रहा है। आत्मिकी के क्षेत्र में यही ज्योति ऊर्जा महाप्रज्ञा के नाम से जानी जाती है। चूँकि यह सचेतन परब्रह्म से उद्भूत होती हैं, इसीलिए उसे जीवन ज्योति भी कहते हैं, जिसका भावार्थ है- चेतनात्मक दिव्य प्रेरणा। ऐसी ऊर्जा, जो मनुष्य के अन्तराल तक प्रवेश कर सकने का मार्ग बनाती है और उस क्षेत्र की रहस्यमय परतों को उभार कर उजागर करती है। इतना उजागर कि मनुष्य अपने में देवस्तर का अवतरण होते प्रत्यक्ष देख सके।

यही है वह प्रकाश, जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य अपने निर्धारित पथ को देख सकता है। उस पर बिना लड़खड़ाए चल सकता है और अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकता है।


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