Published on 2019-11-28
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जीवन और यज्ञ
गीताकार का कथन है-

सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।
गीता 3/10
अर्थात् प्रजापति ने पहले यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा कि ‘‘इस (यज्ञ) से तुम फलो, फूलो और यह (यज्ञ) तुम्हारी अभीष्ट कामनाओं को पूरा करने वाला हो।’’

मनुष्य और यज्ञ जुड़वाँ भाई हैं। दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। जहाँ मनुष्यता होगी वहाँ यज्ञीय भावना अवश्य रहेगी। जो यज्ञीय भावना से रहित है, वह मनुष्य आकृति का प्राणी भले ही हो, उसे सच्चा मनुष्य नहीं कहा जा सकता। यज्ञ और मनुष्य को साथ- साथ उत्पन्न करने के उपरान्त प्रजापति ने मनुष्य को निर्देश किया कि तुम इसे अपनाओ, इसे अपने भीतर और बाहर ओतप्रोत करो, इसी से तुम्हारा कल्याण होगा।
आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, फलने- फूलने के लिए, सुख- शान्तिमय परिस्थितियाँ प्राप्त करने के लिए, जिस यज्ञ को ब्रह्मा ने एक सुनिश्चित तप बताया है, उसका प्रतीक अग्निहोत्र है। हवन द्वारा सुगन्धित, पौष्टिक, आरोग्यवर्धक, उत्तम पदार्थों की आहुति देकर हम उन्हें वायुभूत बनाकर सम्पूर्ण प्राणियों के लिए बाँट देते हैं। इस प्रकार हम अपनी निज की कमाई को दूसरों के लिए, परोपकार के लिए उत्सर्ग करके अपनी उदारता का परिचय देते हैं।
अग्निहोत्र के पीछे जिस आदर्शवादिता का समावेश है, वस्तुत: उसे ही यज्ञ कहते हैं। वायुशोधन आदि लाभ तो गौण हैं। भावनाओं का उत्कर्ष ही धर्म एवं अध्यात्म का मूल प्रयोजन है। समस्त प्रकार के कर्मकाण्ड केवल इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। अग्निहोत्र यज्ञ का बाह्य आवरण एवं कलेवर है। मूल भावना तो उसके पीछे परमार्थ की है। अपनी प्रिय वस्तुएँ स्वयं न खाकर अपने प्रियजनों के लिए ही नहीं, वरन् उन सब प्राणियों के कल्याणार्थ होमते हैं, जिनसे किसी प्रकार का प्रतिफल पाने की आशा नहीं है।


हमारी नैतिक जिम्मेदारी

यज्ञ मानव जीवन की सार्थकता का प्रमुख आधार है। भगवान ने अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को अधिक विभूतियाँ एवं सुविधाएँ दी हैं। इसके पीछे उसका प्रयोजन यही है कि उनके द्वारा यह अपने छोटे भाई- बहिनों को लाभ पहुँचायें, उनकी सहायता करें। पिता अपनी सम्पत्ति और कारोबार की कुञ्जी बड़े बेटे को देता है, इसका प्रयोजन यह नहीं कि बड़ा बेटा उस सौंपी गई साधन सामग्री का स्वयं ही मनमाना लाभ उठाने लगे, वरन् यह है कि उस सम्पदा से पिता के सारे परिवार को सुखी बनाने के लिए अधिकाधिक प्रयत्न करे।
कोई बैंक अपने खज़ाञ्ची के हाथ में नग़दी रखने की जिम्मेदारी सौंपती है तो उसका अर्थ यह नहीं कि उस खज़ाने के धन को वह व्यक्ति अपनी निज की इच्छाओं में ही मनमाना ख़र्च कर डाले। वरन् यह है कि वह बैंक के स्वार्थ एवं प्रयोजन की पूर्ति के लिए उस धन का ठीक तरह उपयोग करने की जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निबाहे।
भगवान ने मनुष्य के शरीर में बोलने, सोचने, करने आदि की ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न की हैं जो अन्य जीवों के शरीर में नहीं है। भगवान की दी हुई इन विशेषताओं के बलबूते पर ही वह इतने सुख- साधन जुटा सकने में समर्थ हुआ है, यदि वे विशेषताएँ प्राप्त न हुई होतीं तो मनुष्य को भी अन्य जीवों की तरह घटिया स्तर का अभावग्रस्त जीवनयापन करने के लिए विवश होना पड़ता। हमें ईश्वर प्रदत्त उस महान प्रतिदान के उद्देश्य को समझना चाहिए। जो उसने सृष्टि की 84 लाख योनियों में से किसी को भी न देकर केवल मनुष्य को ही प्रदान किया है, वह विशेष उत्तराधिकार एवं उत्तरदायित्व ठीक वैसा ही है जैसे कोई सरकार अपने बड़े अफ़सरों या मंत्रियों को विशेष अधिकार प्रदान करती है। उन अफ़सरों को ध्यान रहता है कि जो कुछ हमें मिला है, वह हमारे निज के लिए नहीं, वरन् जनता के लिए है। यदि यह प्रयोजन पूरा न करके कोई अफ़सर उस प्राप्त अधिकार का लाभ स्वयं ही लेने लगे तो उसे अपराधी माना जायेगा और भर्त्सनापूर्वक कठोर दण्ड दिया जायेगा।


हे ईश्वर के वरदपुत्रो!

मनुष्य को सामान्य जीवों की अपेक्षा जो कुछ भी अधिक प्राप्त हुआ, वह केवल इसलिए है कि उसके द्वारा ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति करते रहा जा सके। मनुष्य एक प्रकार से ईश्वर का प्रतिनिधि है। उसके अवतरण का उद्देश्य वही है जो ईश्वर के स्वयं के अवतरण का प्रयोजन होता है। ईश्वर को करुणानिधान, दीनबन्धु, क्षमासिन्धु, दाता, दानी, पवित्र, निर्विकार, नियामक, निष्पक्ष, न्यायकारी आदि गुणों का भाण्डागार माना जाता है। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण वह इतनी बड़ी सृष्टि का निर्माता, नियामक एवं निर्णायक बना हुआ है। भगवान के बड़प्पन में उसकी यह विशेषताएँ ही आधारभूत हैं। संसार की सुख- शान्ति, सुन्दरता, समृद्धि एवं प्रगति भी इन्हीं गुणों पर आधारित है। मनुष्य को उपलब्ध हुई विभूतियाँ इन्हीं ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में ख़र्च होनी चाहिए। जो व्यक्ति ईश्वर की भाँति ही उसकी सृष्टि को सुखी एवं सुन्दर बनाने में अपने अस्तित्व को सौंपते रहते हैं, वे ही मनुष्य जीवन की महत्ता एवं विशेषता को समझते हैं, उन्हीं का जीवन सार्थक बनता है।


गीता का संदेश

गीता में भगवान ने अर्जुन को और अर्जुन के माध्यम से मनुष्यमात्र को एवं समस्त समाज को उद्बोधन कराते हुए आदेश दिया है कि उनका जीवन लक्ष्य एवं उद्देश्य परमार्थ होना चाहिए। शरीर यात्रा के लिए निर्वाह की भी आवश्यक व्यवस्था बनाये रहें, पर वह साधन मात्र होना चाहिए, साध्य नहीं। निर्वाह सामग्री जब लक्ष्य बन जाती है तब वह मनुष्य पथभ्रष्ट होकर नरपशु बन जाता है और उसकी गतिविधियाँ हेय एवं निकृष्ट स्तर पर जा पहुँचती हैं। विवेकशील व्यक्ति वह है जो जीवन के मर्म को समझकर अपनी गतिविधियों में परमार्थ का प्रधान रूप से समन्वय कर लेता है।
गीता में इसी बात को कई जगह कई ढंग से कहा गया है। उन सभी में एक ही तथ्य का प्रतिपादन है कि मानव जीवन का उद्देश्य यज्ञमय भावनाओं के साथ अपनी गतिविधियों का निर्माण करना है। इसी मार्ग का अवलम्बन करके प्रगति, समृद्धि एवं शान्ति के पथ पर अग्रसर हो सकना सम्भव है।


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