युगऋषि द्वारा रहस्योद्घाटन. युगऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि और प्रचण्ड तप शक्ति के संयोग से पर्वों की पुण्य परम्परा को पुनर्जाग्रत् करके उसे युगानुकूल और जनसुलभ बनाया। उसी क्रम में उन्होंने श्रावणी पर्व के संबंध में यह रहस्य खोला कि इसका संबंध उस दिन से है, जिस दिन 'एकोऽहं बहुस्याम की ब्रह्म आकांक्षा पूरी हुई। यह सर्व विदित है कि सृष्टि का प्रादुर्भाव-विस्तार ब्रह्म के संकल्प से हुआ। इसकी पौराणिक कथा सर्वसुलभ है- विष्णु की नाभि से कमलनाल निकली। उस पर कमल खिला और उस कमल पर सृजेता ब्रह्मा जी विराजमान हुए। इस अलंकारिक पौराणिक उपाख्यान का युक्तिसंगत विवेचन युगऋषि ने किया है। लिखा है- ''संकल्प शक्ति क्रिया में परिणत होती है और उसी का स्थूल रूप वैभव एवं घटना क्रम बनकर सामने आता है। नाभि में से, अंतरंग से बहिरंग बनकर विकसित होने वाली कर्म वल्लरी को ही पौराणिक अलंकार में कमल बेल कहा गया है। पुष्प इसी बेल का परिपक्व परिणाम होता है।


 नाभि का यहाँ व्यापक अर्थ लेना होगा। जैसे यज्ञ को विश्व ब्रह्माण्ड की नाभि कहा गया है और परमाणु के केन्द्रक (न्यूक्लियस) को भी नाभिक कहते हैं। नाभि का तात्पर्य वह केन्द्र है, जहाँ से अंतरंग शक्ति बहिरंग को प्रकट करती है। ब्रह्म के संदर्भ में उसका संकल्प ही वह नाभि है, जहाँ से कर्म वल्लरी-सृजन की प्रक्रिया का प्रादुर्भाव होता है। इसी तथ्य को युगऋषि और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं :- ''सृष्टि का सृजन हुआ, उसमें दो तत्व प्रयुक्त हुए, 1. ज्ञान तथा 2. कर्म। इन दोनों के संयोग से सूक्ष्म चेतना-संकल्प शक्ति स्थूल वैभव में परिणत हुई और संसार का विशाल कलेवर बनकर खड़ा हो गया। उसमें ऋद्धि-सिद्धियों का उल्लास भर गया, यह कमल की पंखुडिय़ाँ हैं। मूल है ज्ञान और कर्म, जो ब्रह्म की इच्छा और प्रत्यावर्तन प्रक्रिया द्वारा संभव हुआ।पर्व की गरिमा श्रावणी पर्व का संबंध सृष्टि सृजन के उक्त गरिमामय प्रसंग से है। इसलिए ऋषियों ने इस पर्व को मानवीय गरिमा को सुरक्षित रखने और विकसित-पुष्ट करने वाले सूत्रों के साथ जोड़ा। ज्ञान और कर्म की धारा को परिष्कृत और प्रखर बनाये रखने की रूपरेखा बनाई। इस संदर्भ में य़ुगऋषि लिखते हैं- ''ज्ञान और कर्म के आधार पर ही मनुष्य की गरिमा का विकास हुआ है। इन्हें जो जितना परिष्कृत बनाता चलता है, उसकी प्रगति पूर्णता की दिशा में उतनी ही तीव्र गति से होती है।प्रेरक प्रतीक : जीवन के महत्वपूर्ण कत्र्तव्यों का स्मरण दिलाने के लिए, कत्र्तव्य परायणों में उनकी गरिमा का बोध कराने के लिए उपयुक्त प्रतीकों का प्रयोग चिरकाल से अब तक किया जाता रहा है। सैनिकों को वर्दी के साथ टोपी, बैज आदि दिये जाते हैं। स्काउटों को स्कार्फ आदि पहनाये जाते हैं। इसी प्रकार ज्ञान और कर्म को पवित्र और उच्च स्तरीय बनाये रखने के लिए देव संस्कृति के प्रणेताओं ने उनके दो प्रतीक चिह्न धारण कराने की रीति-नीति बनाई, वे हैं-1. शिखा और 2. यज्ञोपवीत। शिखा : ''ज्ञान को सर्वोच्च महत्ता देनी है। इस तथ्य को याद रखने के लिए शरीर के सर्वोच्च भाग मस्तक पर शिखा रूपी ध्वजा स्थापित कराई जाती है। देव संस्कृति का हर अनुयायी यह ध्यान रखता है कि विचारों को उच्च स्तरीय, ऊध्र्वगामी बनाये रखना है। यज्ञोपवीत : इसे आदर्श कत्र्तव्य, मर्यादाओं से अपने शरीर को, व्यक्तित्व को लपेटकर, कसकर रखने का बोध कराया जाता है। ऋषियों ने इस तथ्य को अनुभव किया कि सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी 'मनुष्य पर ईश्वरीय सृष्टि की गरिमा को बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी आता है। इसलिए उन्होंने सृष्टि के उद्गम के समय से ही ज्ञान और कर्म को परिष्कृत रखने की परिपाटी को बनाये रखने की चेतावनी और जिम्मेदारी मनुष्य को दी। इसी ज्ञान और कर्म की धारा को सही दिशा एवं गति देने के लिए इस पर्व पर वेद और ऋषि पूजन भी किया जाता है। इस संदर्भ में युगऋषि लिखते हैं :- ''वेद अर्थात् सद्ज्ञान। ऋषि अर्थात् वे व्यक्ति, जो सद्ज्ञान को सत्कर्म में परिणत करने के लिए साहसिक तपश्चर्या करते हैं, कष्टसाध्य रीति-नीति अपनाते हैं। श्रावणी पर्व ब्राह्मणत्व के, ऋषित्व के अभिवर्धन का पर्व है। सद्ज्ञान और सत्कर्म की मर्यादाओं का कहीं खण्डन-अतिक्रमण हुआ हो तो उसका प्रायश्चित्त करके, उच्च स्तरीय जीवन को अधिक तेजस्वी बनाने के लिए इस पर्व पर आत्म संकल्प और परमात्म अनुदानों का योग करने का विधान बनाया है।आज की मुख्य आवश्यकता श्रावणी पर्व का महत्त्व इन दिनों भुला दिया गया है। इस पर्व पर ज्ञान और कर्म को परिष्कृत और तेजस्वी बनाने के जो सूत्र दिये गये हैं, वे आज मनुष्यता के सामने आ खड़ी हुई तमाम विसंगतियों का समाधान निकालने में समर्थ हैं। जो भी विसंगतियाँ, विभीषिकायें सामने विकराल मुँह फैलाये खड़ी दिखती हैं, उनके पीछे मूलत: विचारों और कर्मों की अमर्यादा ही है। दुर्विचार से दुष्कर्म तथा दुष्कर्मों से दुर्गति का भयानक चक्र चल पड़ा है। इनका उपचार करना है तो सद्विचार से सत्कर्म और सत्कर्म से सद्गति की प्रक्रिया को प्राणवान और व्यापक बनाना होगा। कोई समय था जब ब्राह्मण एवं ऋषि स्तर के व्यक्तियों की समाज में कमी नहीं थी। उनके आदर्शनिष्ठ, लोकोपकारी जीवन के कारण जन-जन का विश्वास उन पर जमा हुआ था। तब श्रावणी पर्व पर केवल उस स्तर के व्यक्ति अपने जीवन के परिष्कार के क्रम को नये उल्लास-उत्साह से चलाने की प्रक्रिया अपनाते थे, यही पर्याप्त था। उनके मार्गदर्शन, व्यक्ति, परिवार और समाज भी सद्ज्ञान एवं सत्कर्म की मर्यादाओं के पालन का अभ्यास करता रहता था, किन्तु आज तो वह व्यवस्था चरमरा कर टूट-सी गयी है। युगऋषि के मार्गदर्शन, संरक्षण में उसे पुन: स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं। उन्हें क्रमश: और भी अधिक तेजस्वी तथा व्यापक बनाने की जरूरत है। इसलिए श्रावणी पर्व पर दो प्रकार के प्रयोग करने-कराने की जरूरत है। 1. विशिष्ट :- ऋषि, ब्राह्मण जीवन के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को प्रखर, प्राणवान, प्रभावी बनाने के लिए संकल्पित व्यक्तियों द्वारा सम्पूर्ण श्रावणी उपाकर्म को भावनापूर्वक सम्पन्न किया जाय। इसके लिए पारिवारिक तथा संगठन स्तर पर सामूहिक व्यवस्थाएँ बनाई जायें। शामिल होने वालों के बीच पर्व के पहले गंभीर चिन्तन परक गोष्ठियाँ चलाई जायें। युगऋषि के संरक्षण, मार्गदर्शन में समाज को आध्यात्मिक जीवन्त नेतृत्व प्रदान करने की अपनी जीवन-साधना को अधिक धारदार बनाने और उस आधार पर उनके विशेष अनुदानों को पाने की पात्रता विकसित करने के संकल्प के साथ श्रावणी उपाकर्म मे भागीदार बनें। इनके लिए पर्व पूजन की व्यवस्था सवेरे निर्धारित विधान के साथ मंत्र सहित की जा सकती है। 2. सामान्य :- इसके अलावा जन सामान्य को श्रावणी पर्व का महत्व समझाते हुए उन्हें उस दिशा में आंशिक रूप से ही सही, किन्तु सुनिश्चित भागीदारी के लिए प्रेरित करना भी जरूरी है। इसके लिए पर्व के पहले प्रेरणा गोष्ठियाँ विभिन्न शिक्षण संस्थानों, धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों के बीच, मोहल्लों आदि में की जा सकती हैं। उन्हें समझाया जाय कि श्रावणी पर्व मनुष्य को आदर्श मानवीय गरिमा की मर्यादाओं के अनुगमन की प्रेरणा तथा शक्ति प्रदान करने के लिए आता है। जो इसका लाभ उठायेंगे, वे अपने जीवन को तो सराहनीय-अनुकरणीय बनायेंगे ही, अपने समाज, राष्ट्र और विश्व को उन्नत बनाने वालों के श्रेय-सौभाग्य के भी अधिकारी बनेंगे। इनके लिए उस वर्ग की सुविधानुसार दिन में या शाम को एक-सवा घण्टे का एक संक्षिप्त कार्यक्रम रखा जा सकता है। उसमें उचित व्याख्या के साथ सीमित कर्मकाण्ड कराये जायें। जैसे— * ज्ञान और कर्म की उपेक्षा से हुई हानियों तथा उनके वरण से होने वाले लाभों पर संक्षिप्त प्रकाश डालना। * सद्ज्ञान की मर्यादा में आने के लिए नियमित स्वाध्याय के संकल्प के साथ शिखामूल का, अपने मस्तिष्क का सिंचन। * सत्कर्म की मर्यादा में आने के लिए संयम एवं सेवाकार्यों द्वारा यज्ञीय जीवन का आभास करने का संकल्प कराया जाय। प्रतीक के रूप में उन्हें रक्षासूत्र प्रदान किया जाय। वे उसे मस्तक से लगाकर रख लें, बाँधे नहीं। * तुलसी आरोपण एवं वृक्षारोपण का महत्त्व समझाकर उसके लिए संकल्प कराया जाय। हो सके तो तुलसी तथा श्रेष्ठ वृक्षों की पौध वितरित करने की व्यवस्था भी बनाई जाये। रक्षाबंधन का मर्म समझाया जाय। प्राचीनकाल में साधक यजमान जब श्रेष्ठ जीवन जीने का संकल्प लेते थे, तो तपस्वी, ब्राह्मण, पुरोहित अपने तप और अनुभव के द्वारा उन्हें संरक्षण तथा मार्गदर्शन देते रहने के लिए रक्षा सूत्र बाँधते थे। भाई-बहिन के बीच पवित्र प्रेम की परम्परा को जीवन्त बनाये रखने के लिए भी रक्षाबन्धन का उपयोग किया जाता था। कालान्तर में उनके आदर्श लुप्त हो गये, रूढिग़त परम्पराओं के निर्वाह का यान्त्रिक क्रम चल पड़ा। पूर्व पूजन क्रम में जिन आदर्शों के पालन एवं अभ्यास के संकल्प लिये गये हैं, उनको निभाने के प्रतीकबन्धन के रूप में तथा उनके लिए ऋषि चेतना के अनुदान-अनुग्रह पाने की पवित्र भावना के साथ जो रक्षासूत्र वितरित किये गये हैं, उन्हें बाँधने का क्रम चलाया जाय। अच्छा हो कि साधकों और कुमारी कन्याओं को भागीदारी की संख्या के अनुरूप उचित संख्या में रक्षासूत्र बाँधने के लिए नियुक्त किया जाय। वह सम्भव न हो सके, तो ऋषि चेतना का ध्यान करते हुए परस्पर रक्षासूत्र बाँधने का क्रम सम्पन्न किया जाय। अंत में संक्षिप्त दीपयज्ञ करके संकल्प और शान्तिपाठ, अभिसिंचन करके कार्यक्रम सम्पन्न किया जा सकता है। इसके लिए पहले से प्रेरणा देकर आयोजनों में भागीदारी के लिए व्यक्तियों को प्रेरित-संकल्पित करने की टोलियाँ तैयार कर लेनी चाहिए। उनकी प्रेरणा से जो कार्यक्रम निश्चित हो जायें, उनके लिए कार्यक्रम संचालन की टोलियाँ तैयार करके उन्हें नियुक्त किया जा सकता है। इन आयोजनों में भागीदारों को युग निर्माण सत्संकल्प के छपे हुए कार्ड भी वितरित किए जा सकते हैं। वितरण के पूर्व यह समझाया जाय कि इसमें मानवीय गरिमा को जीवन्त बनाये रखने योग्य सार्वभौम सूत्र हैं। जो इनके अनुसार जीवन को खरादने-सँवारने का प्रयास करेंगे, अपने-अपने क्षेत्र और वर्ग के बीच अनुकरणीय व्यक्तित्व सम्पन्न होने का श्रेय-यश प्राप्त कर सकेंगे। श्रावणी पर्व के लिए भी उसी स्तर के प्रयास और प्रयोग किये जा सकते हैं, जैसे स्कूल-स्कूल में विद्यारम्भ, ज्ञानदीक्षा अथवा संगठनों में होली मिलन के कार्यक्रम समय और सुविधानुसार किये-कराये जाते हैं। पर्वों की यह शृंखला गायत्री जयंती से लेकर गुरुपूर्णिमा तथा श्रावणी तक की यह पर्व शृंखला अपने आपमें अद्भुत है। गायत्री से परिष्कृत प्रखर प्राणों का अनुदान प्राप्त करके, उन्हें गुरु अनुशासन में पूरी तत्परता से नियोजित करके जीवन के सर्वोच्च स्तर-ऋषि स्तर तक पहुँचने के अद्भुत साधनाक्रम को हर वर्ष निखारा और सँवारा जा सकता है। अपना देव परिवार इस दिशा में संकल्पित-योजनाबद्ध प्रयास करे, तो युग परिवर्तन के लिए सशक्त आधार बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।


Write Your Comments Here:


img

तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रकाश ही जीवन है प्रकाश ही जीवन है और अन्धकार ही मरण। प्रकाश में वस्तुओं का स्पष्ट रूप दर्शाने.....

img

गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘.....